मंगलवार, 28 जनवरी 2020

भगवान शिव ने मातापार्वती को बताए थे जीवन के ये पांच रहस्य!


भगवान शिव ने देवी पार्वती को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं। जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। भगवान शिव ने देवी पार्वती को पांच ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिएं।

1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप।

देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते है।

श्लोक- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।
अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।
इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।

2. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान।

श्लोक- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।
अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।
कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।

3. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा।

श्लोक-मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।
अर्थात-आगे भगवान शिव कहते है कि किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।
यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मारने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।

4. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात।
संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।

श्लोक-दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।
अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।

5. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना।

श्लोक-नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
अर्थात- आगे भगवान शिव मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएंं।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

सिर पर चोटी क्यो रखी जाती है?


भारतीय संस्कृति में शिखा हिन्दुत्व की प्रतीक है कारण इसे धारण करने में अनेक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ हैं। शिखा- स्थान मस्तिष्क की नाभी है, इस केंद्र से उस सूक्ष्म तंतुओं का संचालन होता है ,जिसका प्रसार समस्त मष्तिक में हो रहा है और जिनके बल पर अनेक मानसिक शक्तियों का पोषण और विकास होता है। इस केंद्र स्थान से विवेक दृढ़ता , दूरदर्शिता ,प्रेम शक्ति और संयम शक्तियों का विकास होता है।

ऐसे मर्म स्थान पर केश रक्षने से सुरक्षा हो जाती है। बालों में बाहरी प्रभाव को रोकने की शक्ति है। शिखा स्थान पर बाल रहने से अनावश्यक सर्दी- गर्मी का प्रभाव नही पड़ता। उसकी सुरक्षा सदा बनी रहती है।
शिखा से मानसिक शक्तियों का पोषण होता है। जब बाल नहीं काटे जाते, तो नियत सीमा पर पहुँच कर उनका बढ़ता बन्द हो जाता है। जब बढ़ता बन्द हो आया तो केशों की जड़ों को बाल बढऩे के लिए रक्त लेकर खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बचा हुआ रक्त उन पाँच शक्तियों का पोषण करने में खर्च होता है, जिससे उनका पोषण और विकास अच्छी तरह होता है। इससे मनुष्य विवेकशील, दृढ़ स्वभाव, दूरदर्शी, प्रेमी और संयमी बनता है।

वासना को वश में रखने का एक उपाय शिखा रखना है। बाल कटाने से जड़ों में एक प्रकार की हलचल मचती है। यह खुजली मस्तिष्क से सम्बद्ध वासना तन्तुओं में उतर जाती है। फलस्वरूप वासना भड़कती है। इस अनिष्ट से परिचित होने के कारण ऋषि- मुनि केश रखते हैं और उत्तेजना से बचते हैं।

बालों में एक प्रकार का तेज होता है। स्त्रियाँ लम्बे बाल रखती हैं, तो उनकी तेजस्विता बढ़ जाती है। पूर्व काल के महापुरुष बाल रखाया करते थे, और वे तेजस्वी होते थे। शिखा स्थान पर बाल रखने से विशेष रूप से तेजस्विता बढ़ती है।

शिखा स्पर्श से शक्ति का संचार होता है। यह शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि चाणक्य ने शिखा को हाथ में लेकर अर्थात् दुर्गा को साक्षी बना कर नन्द वंश के नाश की प्रतिज्ञा की थी और वह अंत: पूरी हुई थी। शक्ति रूपी शिखा को श्रद्धापूर्वक धारण करने से मनुष्य शक्तिसम्पन्न बनता है। हिन्दू धर्म, हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू संस्कृति, की ध्वजा इस शिखा को धारण करना एक प्रकार से हिन्दुत्व का गौरव है।
शिखा के निचले प्रदेश में आत्मा का निवास योगियों ने माना है। इस प्रकार इस स्थान पर शिखा रूपी मंदिर बनाना ईश्वर प्राप्ति में सहायक होता है।

मनुष्य के शरीर पर जो बाल हैं, ये भी छिद्र युक्त हैं। आकाश में से प्राण वायु खींचते हैं, जिससे मस्तिष्क चैतन्य, पुष्ट और निरोग रहता है। सिर के बालों का महत्त्व अधिक है, क्योंकि वे मस्तिष्क का पोषण करने के अतिरिक्त आकाश से प्राण वायु खींचते हैं।

अनुष्ठान काल में बाल कटाना वर्जित है। किसी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए बाल कटाना वर्जित है। इसका कारण यह है कि बाल रखने से मनोबल की वृद्धि होती है और दृढ़ता आती है। संकल्प पूर्ण करने का मार्ग सुगम हो जाता है।मनोबल की वृद्धि के लिए शिखा आवश्यक है।

प्राचीन काल में जिसे तिरस्कृत, लज्जित या अपमानित करना होता था, उसका सिर मुँडा दिया जाता था। सिर मुँडा देने से मन गिर जाता है और जोश ठण्डा पड़ जाता है। नाड़ी तन्तु शिथिल पड़ जाता है। यदि अकारण मुंडन कराया जाय, तो उत्साह और स्फूर्ति में कमी आ जाती है।

सिक्ख धर्म में सिखा का विशेष महत्त्व है। गुरुनानक तथा अन्य सिक्ख गुरुओं ने अपने अध्यात्म बल से शिखा के असाधारण लाभों को समझकर अपने सम्प्रदाय वालों को पाँच शिखाएँ अर्थात् पाँच स्थानों पर बाल रखने का आदेश दिया।

शिखा को शिर पर स्थान देना धार्मिकता या आस्तिकता को स्वीकार करना हे। ईश्वरीय संदेशों को शिखा के स्तम्भ द्वार ग्रहण किया सकता है। शिखाधारी मनुष्य दैवीय शुभ संदेशों को प्राप्त करता है और ईश्वरीय सन्निकटता सुगमतापूर्वक सुनता है। शिखा हिन्दुत्व की पहचान है, जो सदा अन्त समय तक मनुष्य के साथ चलता है।इस प्रकार विवेकशील हिन्दू को सिर पर शिखा धारण करनी चाहिए ।।

एक सुप्रीप साइंस जो इंसान के लिये सुविधाएं जुटाने का ही नहीं, बल्कि उसे शक्तिमान बनाने का कार्य करता है। ऐसा परम विज्ञान जो व्यक्ति को प्रकृति के ऊपर नियंत्रण करना सिखाता है। ऐसा विज्ञान जो प्रकृति को अपने अधीन बनाकर मनचाहा प्रयोग ले सकता है। इस अद्भुत विज्ञान की प्रयोगशाला भी बड़ी विलक्षण होती है। एक से बढ़कर एक आधुनिकतम मशीनों से सम्पंन प्रयोगशालाएं दुनिया में बहुतेरी हैं, किन्तु ऐसी सायद ही कोई हो जिसमें कोई यंत्र ही नहीं यहां तक कि खुद प्रयोगशाला भी आंखों से नजर नहीं आती। इसके अदृश्य होने का कारण है- इसका निराकार स्वरूप। असल में यह प्रयोगशाला इंसान के मन-मस्तिष्क में अंदर होती है।

सुप्रीम सांइस- विश्व की प्राचीनतम संस्कृति जो कि वैदिक संस्कृति के नाम से विश्य विख्यात है। अध्यात्म के परम विज्ञान पर टिकी यह विश्व की दुर्लभ संस्कृति है। इसी की एक महत्वपूर्ण मान्यता के तहत परम्परा है कि प्रत्येक स्त्री तथा पुरुष को अपने सिर पर चोंटी यानि कि बालों का समूह अनिवार्य रूप से रखना चाहिये।

सिर पर चोंटी रखने की परंपरा को इतना अधिक महत्वपूर्ण माना गया है कि , इस कार्य को हिन्दुत्व की पहचान तक माना लिया गया। योग और अध्यात्म को सुप्रीम सांइस मानकर जब आधुनिक प्रयोगशालाओं में रिसर्च किया गया तो, चोंटी के विषय में बड़े ही महत्वपूर्ण ओर रौचक वैज्ञानिक तथ्य सामने आए।

चमत्कारी रिसीवर- असल में जिस स्थान पर शिखा यानि कि चोंटी रखने की परंपरा है, वहा पर सिर के बीचों-बीच सुषुम्ना नाड़ी का स्थान होता है। तथा शरीर विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि सुषुम्रा नाड़ी इंसान के हर तरह के विकास में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चोटी सुषुम्रा नाड़ी को हानिकारक प्रभावों से तो बचाती ही है, साथ में ब्रह्माण्ड से आने वाले सकारात्मक तथा आध्यात्मिक विचारों को केच यानि कि ग्रहण भी करती है

क्यों रखी जाती है सिर पर शिखा?
सिर पर शिखा ब्राह्मणों की पहचान मानी जाती है। लेकिन यह केवल कोई पहचान मात्र नहीं है। जिस जगह शिखा (चोटी) रखी जाती है, यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। शिखा एक धार्मिक प्रतीक तो है ही साथ ही मस्तिष्क के संतुलन का भी बहुत बड़ा कारक है। आधुनिक युवा इसे रुढ़ीवाद मानते हैं लेकिन असल में यह पूर्णत: है। दरअसल, शिखा के कई रूप हैं।

आधुनकि दौर में अब लोग सिर पर प्रतीकात्मक रूप से छोटी सी चोटी रख लेते हैं लेकिन इसका वास्तविक रूप यह नहीं है। वास्तव में शिखा का आकार गाय के पैर के खुर के बराबर होना चाहिए। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे सिर में बीचोंबीच सहस्राह चक्र होता है। शरीर में पांच चक्र होते हैं, मूलाधार चक्र जो रीढ़ के नीचले हिस्से में होता है और आखिरी है सहस्राह चक्र जो सिर पर होता है। इसका आकार गाय के खुर के बराबर ही माना गया है। शिखा रखने से इस सहस्राह चक्र का जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

वैष्णव और शैव की अद्भुत कथा, ॐ हरि हराय् नमः


एक समय की बात है की महर्षि गौतम ने भगवान शंकर को खाने पर आमंत्रित किया। उनके इस आग्रह को शिव जी ने स्वीकार कर लिया उनके साथ चलने के लिए भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी भी तैयार हो गए। महर्षि के आश्रम मे पहुच कर तीनो वहाँ बैठ गए।

भोले बाबा और श्री हरी विष्णु एक शैय्या पर लेटकर बहुत देर तक प्रेमालाप करते रहे। इसके बाद उन दोनो ने आश्रम के पास ही एक तालाब मे नहाने चले गए वहा पर भी वे बहुत देर तक जलक्रीडा करते रहे। भगवान शिव जी ने पानी मे खडे श्री हरी पर जल की कोमल बूंदों से प्रहार किया इस प्रहार को विष्णु जी सहन ना कर सके और अपनी आँखें मुँद ली। इस पर भी भगवान शिव जी को संतोष नही मिला और वे झट से कुदकर वे विष्णु जी के कंधे पर चढ गए और भगवान विष्णु को कभी पानी मे दबा देते तो कभी पानी के ऊपर ले आते इस प्रकार बार-बार तंग करने पर विष्णु जी ने भी अब शिव जी को पानी मे दे मारा।

दोनो के इस प्रकार के खेल को देखकर देवता गण हर्षित हो रहे थे और दोनो की लीला को देखकर मन ही मन उन्हे प्रणाम कर रहे थे। उसी समय नारद जी वहाँ से गुजर रहे थे ये लीला देखकर वे सुंदर वीणा बजाने लगे और गाना भी गाने लगे उनके साथ शिव जी भी भीगे शरीर मे ही सुर से सुर मिलाने लगे फिर तो विष्णु जी भी पानी से बाहर आकर म्रदंग बजाने लगे। जब ब्रह्मा जी ने स्वर सुना तो फिर वे भी मस्ती के इस क्रम मे शामिल हो गए।

बची-खुची जो भी कसर थी वो श्री हनुमान जी ने पुरी कर दी जब वे राग आलापने लगे तो सभी चुप हो कर शान्ति से उनका संगीत सुनने लगे। सभी देव, नाग, किन्नर, गन्धर्व आदि उस अलौकिक लीला को देख रहे थे और अपनी आँखें धन्य कर रहे थे। उधर महर्षि गौतम ये सोचकर परेशान थे कि स्नान को गए मेरे पुज्य अतिथि गण अब तक क्यो नही आए उन्हे चिन्ता हो रही थी और इधर तो भगवान को धमाचौकड़ी मचाने से फुर्सत कहाँ।

सब एक दुसरे के गाने बजाने मे इतने मगन थे कि उन्हे ये भी याद न रहा कि वे महर्षि गौतम के अतिथि बन यहाँ आए हैं। फिर महर्षि गौतम ने बड़ी ही मुश्किल से उन्हे भोजन के लिए मनाया आश्रम लेकर आए और भोजन परोसा।

तीनो ने भोजन करना शुरु किया। इसके बाद हनुमान जी ने फिर संगीत गाना शुरु कर दिया। सुर मे मस्त शिव जीने अपने एक पैर को हनुमान जी के हाथों पर और दुसरे पैर को हनुमान जी सीने, पेट, नाक,आँख आदि अंगो का स्पर्श कर वही लेट गये। यह देखकर भगवान विष्णु ने हनुमान से कहा – “हनुमान तुम बहुत ही भाग्यशाली हो जो शिव जी के चरण तुम्हारे शरीर को स्पर्श कर रहे है। जिस चरणो की छाँव पाने के लिए सभी देव-दानव आदि लालायीत रहते है।

उन चरणो की छाँव सहज ही तुम्हे प्राप्त हो गये है। अनेक साधु-संत और कई साधक जन्मो तक तपस्या और साधना करते है फिर भी उन्हे ये सौभाग्य प्राप्त नही होता। मैंने भी सहस्त्र कमलों से इनकी अर्चना की थी पर ये सुख मुझे भी न मिला। आज मुझे तुमसे ईष्या का अनुभव हो रहा हैं। सभी लोको मे यह बात सब जानते है कि नारायण भगवान शंकर के परम प्रितीभाजन है पर यह देखकर मुझे संदेह-सा हो रहा है।” यह सुन कर भगवान शिव शंकर बोल उठे- “हे नारायण ये क्या कह रहे है आप तो मुझे प्राणो से भी प्यारे है।

औरो की क्या बात है देवी पार्वती भी आपसे अधिक प्रिय नही है मेरे लिए आप तो जानते ही है।” भगवती पार्वती जी उधर कैलाश मे ये सोचकर परेशान हो रही थीं कि आज कैलाशपति शिव जी कहाँ चले गये कही मुझे से रुठकर तो नही चले गये। यह सोचकर देवी पार्वती शिव जी को ढुढते- ढुढते आश्रम पहुचे और पता चला कि मेरे स्वामी शिव जी, विष्णु जी और ब्रह्मा जी महर्षि गौतम के यहा मेहमानी मे गये हैं। उन्होनें भी महर्षि गौतम का परोसा खाना खाया। इसके बाद विनोदवश देवी पार्वती ने शिव जी के वेश-भूषा को लेकर हंसी उड़ाई और बहुत सी ऐसी बातें कही जो अक्सर पति पत्नि प्रेम से एक दुसरे को कुछ भला बुरा कहते रहते हैं।

ये बात सुनकर भगवान विष्णु जी से रहा नही गया और वे बोल उठे- “देवी! ये आप क्या कह रही है। मुझसे आपकी बात सही नही जा रही। जहाँ शिव निन्दा होती है वहाँ मैं प्राण धारण कर नही रह सकता।” इतना कहकर श्री हरी ने अपने नाखुनो से अपने ही सिर को फाड़ने लगे। यह देखकर सभी ने उन्हें रोकने की कोशिश की पर वे नही मान रहे थे फिर शिव जी के अनुरोध पर वे रुके। इनके इस प्रेम को देखकर हमे ये समझना चाहिए कि ये दोनो किसी भी प्रकार से अलग नहीं हैं, फिर हम किस कारण विवाद करते है किसी को श्रेष्ठ और किसी को निम्न कहते है।

हिन्दू धर्म में, विष्णु (=हरि) तथा शिव (=हर) का सम्मिलित रूप हरिहर कहलाता है। इनको 'शंकरनारायण' तथा 'शिवकेशव' भी कहते हैं। विष्णु तथा शिव दोनों का सम्मिलित रूप होने के कारण हरिहर वैष्णव तथा शैव दोनों के लिये पूज्य हैं।
ॐ हरि हराय् नमः
💓महादेव💓☘️ हरि हर🌿💓 महादेव

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

शनि देव जी की कथा



 एक बार सभी ग्रह एक साथ इकट्ठे हुए और आपस में बाते करने लगे | कुछ विषयों पर बात करते करते वो एक विषय पर आकर रुक गये कि “सबसे सम्मानित ग्रह कौनसा है ” | वो सब आपस में तर्क वितर्क करने लगे लेकिन कोई नतीजा नही निकला इसलिए उन्होंने इंद्र देव के पास जाने का विचार किया | तो सभी ग्रह इंद्र देव के पास गये और वो भी विस्मय में पड़ गये क्योंकि अगर वो किसी को उचा नीचा दिखायेंगे तो किसी भी ग्रह का कोप उन पर गिर सकता था | कुछ देर बाद विचार करने के बाद इंद्र देव ने कहा “मान्यवरो , मै इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हु लेकिन उज्जैयनी नगर में विक्रमादित्य नाम का राजा है जो आपके प्रश्न का उत्तर दे सकता है ” | इस तरह इंद्र देव के कहने पर सभी ग्रह राजा विक्रम के दरबार में गये |

विक्रमादित्य उस समय का सबसे पसंदीदा राजा था क्योंकि वो अपने न्याय के लिए प्रसिद्ध था | जब उसने देखा कि सभी ग्रह उसके दरबार में आ रहे है तो वो तुंरत अपने सिंहासन से उठ गया और उन्हें अपने आसनों पर बैठने को कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया | उन्होंने कहा “हम यहा तब तक आसनों पर नही बैठेंगे जब तक तुम ये न्याय ना कर दो कि हम सब में से सबसे ऊचा ग्रह कौनसा है ” | विक्रमादित्य भी ऐसा प्रश्न सुनकर विस्मय में पड़ गया लेकिन फिर उसने एक योजना बनाई | उसने आसनों की एक कतार उसके सिंहासन से द्वार तक बनाई और उन्हें बैठने को कहा जब तक कि वो इसका निर्णय करते है |

विक्रम के सबसे निकट वाले आसन पर बृहस्पति जी दौड़ते हुए जाकर बैठ गये | अगले आसन पर सूर्य , उसके बाद चन्द्रमा ,उसके बाद मंगल , फिर राहू ओर फिर केतु बैठ गये | शुक्र देव आठवे आसन पर बैठ गये और अब अंतिम आसन बचा था और शनि देव बच गये थे | लेकिन वो आसन सबसे अंतिम था और द्वार के नजदीक था इसलिए शनि देव ने वहा बैठने से मना कर दिया | विक्रम ने सोचा कि जो भी उस अंतिम आसन पर बैठकर विनम्रता दर्शायेगा उसे ही वो सबसे महान घोषित करेंगे लेकिन शनि देव के वहा नही बैठने से सब गडबड हो गया |

शनि देव एक क्रोध वाले देवता है | जब वो वहा पर नही बैठे तो सभी ग्रह हसने लग गये | शनि देव ने इसे अपना अपमान मानते हुए बहुत क्रोधित हुए और विक्रम से कहा “तुमने इस तरह मेरा अपमान करके अच्छा नही किया , तुम मुझे क्या मानते हो ? तुम मुझे अंत में बिठाने के लिए बुलाया है ? एक बात ध्यान रखना कि किसी भी राशि में चन्द्रमा सवा दो दिन ; सूर्य , बुध और शुक्र केवल 15 दिन ; मंगल 2 महीने ; गुरु 13 महीने और राहू-केतु 18 महीने तक रहते है लेकिन मै साढ़े सात साल तक किसी भी राशि में रहता हु | इसलिए तुम अब अपना ध्यान रखो , तुम्हे भी मेरे अपमान का दंड सहना पड़ेगा | ”

राजा विक्रम कुछ दिनों तक बिना कीसी मुसीबत के दिन गुजारे लेकिन जल्द ही राजा के साढ़े साती शुरू हो गये | उन दिनों में एक अश्व व्यापारी वहा आया और वहा घोड़े बेचने के लिए रुका | राजा ने भी कुछ सुंदर घोड़े खुद के लिए खरीदे | उनमे से एक घोड़े का नाम भंवर था जिसे राजा बहुत पसंद करता था | राजा उस घोड़े पर सवार हो गया और इधर उधर घुमने लगा तभी कुछ देर बाद वो दौड़ता हुआ राजा को एक घने जंगल में छोडकर भाग गया | राजा को ये देखकर बहुत आश्चर्य हुआ और अब वो उस जंगल में भूखा-प्यासा भटकने लगा |

जब रात हुयी तो राजा को बड़ी जोरो की प्यास लगी जिससे वो जोर जोर से चिल्लाने लगा | एक दूधवाला उस रास्ते से गुजर रहा था उसने विक्रम को देख लिया | वो विक्रम को पास की नदी पर लेकर गया और उसे शीतल जल पिलाया | विक्रम बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस दूधवाले को अपनी सोने की अंगूठी निकालकर दे दी और कहा “मै उज्जैन रहता हु और रास्ता भटक गया हु , क्या तुम मुझे रास्ता बता सकते हो ” | वो दूधवाला उसको गाँव में लेकर आया और उसको एक दुकानदार ने भोजन कराया | विक्रम ने दुकानदार को भी एक अंगूठी दी और उसको भी विक्रम ने रास्ता भटकने वाली बात बताई |

अब वो उस दुकानदार के साथ पुरे दिन बाते करता रहा और उस दिन दुकानदार को खूब आमदनी हुयी | उसने सोचा इस आदमी की वजह से उसकी आज अच्छी आमदनी हुयी इसलिए उसने विक्रम को उसके साथ शाम को घर चलने को कहा | विक्रम उसके साथ घर गया और दुकानदार ने उसकी खूब खातिरदारी की | अब खाना खाते वक़्त एक अजीब घटना हुयी , जब विक्रम खाना खा रहा था तो वहा पर दीवार पर रखा हुआ सोने का हार गायब हो गया | दुकानदार की नौकरानी ने उसकी पत्नी को गले का हार चोरी होने की खबर दी | जब दुकानदार ने ये बात सूनी तो उसने विक्रम से हार के बारे में पूछा तो विक्रम के हार के बारे में कुछ भी पता होने से इंकार कर दिया |

दुकानदार ने कहा “जब हार चोरी हुआ तक तुम्हारे अलावा यहा कोई बाहर का व्यक्ति नही था , तुम जल्दी बताओ कि वो हार कहा है ” | विक्रम ने कहा “मै हार के बारे में कुछ नही जानता हु और मैंने हार नही चुराया है “| दुकानदार विक्रम को राजा के पास लेकर गये | जब राजा ने विक्रम के भोले चेहरे को देखा तो उसने कहा “ये आदमी कुछ चोरी नही कर सकता है ” | इस तरह राजा ने विक्रम को आजाद कर दिया | अब विक्रम शहर में घूम रहा था तभी के तेली ने उसे देखा और उसको अपने यहाँ काम करने के लिए पुछा | उस तेली ने विक्रम को काम के बदले रहने खाने की व्यवस्था देने को कहा | विक्रम राजी हो गया और वो तेली विक्रम को घर लेकर आ गया |
अब विक्रम कोल्हू के बैल को चलाने का काम करने लगा और वो तेली तेल को बाजार में बेचने जाता था | जब बारिश का मौसम आया तब विक्रम तेज आवाज में गाना गाने लगा | उसकी आवाज पास ही राजा के महल तक पहुच गयी और राजकुमारी इस मधुर स्वर पर मोहित हो गयी | उसने अपनी दासी को भेजकर उस आदमी का पता लगाने को कहा | दासी वहा गयी और उसने राजकुमारी को बताया कि एक नौजवान अपनी आंखे बंद कर गा रहा था | राजकुमारी उसके प्यार में खाना पीना भूल गयी थी | उसकी माँ ने उससे अपनी इस दशा का कारण पूछा | राजकुमारी ने कहा कि वो अगर वो विवाह करेगी तो सिर्फ उस मधुर गाना गाने वाले तेली से विवाह करेगी |

जब राजा ने अपनी पुत्री की ये मांग सूनी तो वो बहुत क्रोधित हुआ | उसने विक्रम को बुलाया और उसके हाथ काटकर उसे जंगल में फेंक दिया | जब राजकुमारी को इस बात का पता चला तो उसने अपने मन को मजबूत करते हुए कहा कि अगर वो विवाह करेगी तो सिर्फ उसी तेली से चाहे उसके हाथ हो या ना हो | अपनी बेटी की जिद को देखते हुए राजा ने विक्रम को बुलाया और उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया | राजा ने उनके रहने के लिए एक साधारण घर भी दिया |

एक दिन विक्रम सो रहा था और शनि देव उसके स्वप्न में आये , उसने शनि देव को प्रणाम किया और गलती की माफी माँगी | शनि देव ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा “अब तुम्हारे साढ़े साती खत्म होते है ” | और विक्रम के दोनों हाथ वापस आ गये | विक्रम ने अपनी पत्नी को नही जगाया और सुबह उसकी पत्नी उसके दोनों हाथ देखकर बहुत खुश हुयी | राजा को भी इस खबर का पता चल गया तो वो भी विक्रम को देखने आया और उसने बताया कि वो शनि देव का कोप झेल रहा था और उन्ही की दयालुता से उसके दोनों हाथ वापस आ गये | तब उसने राजा को अपना पूरा परिचय दिया | विक्रम का परिचय सुनकर राजा उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा |

जब दुकानदार को इस बात का पता चला तो वो भी दौड़ता हुआ विक्रम के चरणों में गिर गये | विक्रम ने उस दुकानदार से कहा “घर जाओ , तुम्हे तुम्हारा हार वापस वही मिल जाएगा ” | दुकानदार घर गया और हार उसी जगह पर टंगा हुआ मिला |विक्रम ने राजा को वापस अपने प्रदेश लौटने को कहा | राजा ने उसे उपहारस्वरुप कई घोड़े ,हाथी और दसिया देकर विदा किया | विक्रमादित्य की जनता अपने राजा के वापस लौटने पर बहुत प्रसन्न हुयी | विक्रम ने अब नवग्रह की पूजा की और शनि देव को सबसे उच्च स्थान दिया।

शिव त्रिपुरारी


भगवान शिव को उनके भक्त त्रिपुरारी के नाम से पूजते है इसके पीछे शिवपुराण की एक कथा है।

शिवपुराण के अनुसार एक बार एक महादैत्य हुआ जिसका नाम था तारकासुर। इन दैत्य के तीन पुत्र हुए जिनके नाम तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली था। शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया । इस घटना से तीनो पुत्रो ने बदला लेने के लिए घोर तपस्या की और ब्रह्माजी को प्रसन्न कर दिया । उन्होंने अमरता का वरदान माँगा पर ब्रह्माजी ने इसमे असमर्था दिखाई और अन्य कोई वरदान मांगने के लिए कहा।

तब तीनो ने ब्रह्माजी से कहा की हम तीनो के लिए ऐसे तीन नगर बसाये जो आकाश में उड़ते हो और एक हजार साल बाद हम तीनो जब मिले तब एक ही बाण से हम एक साथ मर सके , बस इसके अलावा हमारी मृत्यु नही हो। ब्रह्माजी ने उन्हें यह वरदान दे दिया ।

वरदान पाकर उन तीनो भाइयो ने हर लोक में अलग अलग होकर अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया, मनुष्य देवता सभी उनसे भय खाने लगे। सभी त्राहिमाम त्राहिमाम करते करते भगवान शिव के पास गये और अपने भय और दुःख और उनके समक्ष प्रकट किया। उनकी करुणामई विनती पर शिवजी उन तीनो का वध करने के लिए तैयार हो गये ।

विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया।

कैसा था यह दिव्य रथ 
इस दिव्य रथ में सभी देवी देवताओ की शक्ति समाहित थी। सूर्य चन्द्र इस रथ के पहिये बने, यम कुबेर इंद्र अरुण आदि देवता इस रथ के घोड़े बन गये। भगवान विष्णु वो दिव्य तीर बने और शेषनाग बना धनुष की प्रत्यंचा और हिमालय पर्वत बना धनुष, फिर भगवान शिव इस रथ में सवार होकर सही समय पर उन तीनो भाइयो के समक्ष खड़े हो गये । जैसे ही वो तीनो भाई एक सीध में खड़े हुए तभी शिवजी ने अपना धनुष से तीर चला दिया। ऐसा दिव्य तीर देखकर दैत्यों में हाहाकार मच गया। तीर तीनो भाइयो (त्रिपुरो ) को लगा और क्षण भर में ही उनके प्राण निकल गये। सभी देवी देवताओ ने शिवजी की जयजयकार त्रिपुरारी के नाम से लगाईं।

जय हो त्रिपुरो का अंत करने वाले शिव त्रिपुरारी जी की।
।। हर हर त्रिपुरारी महादेव ।।

रविवार, 1 दिसंबर 2019

श्री दुर्गा चालीसा


 ॥चौपाई॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर-खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजे॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगर कोटि में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब विनशावै॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥
जब लगि जियउं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
दुर्गा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥