शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

हनुमान चालीसा (हिंदी में अर्थ के साथ)


हनुमान चालीसा (हिंदी में अर्थ के साथ)




॥दोहा॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि

( दिव्य गुरु के कमल जैसे पाद के धूल को स्पर्श कर मैं मेरे आईना जैसे मन को स्वच्छ करता हूँ और भगवान राम की महिमा के गुण गाता हूँ )

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार

( मैं अपनी अविद्या को स्वीकार करते हुए आपको याद करता हूँ श्री हनुमान कृपया मुझे शक्ति, विद्या और ज्ञान दें और मुझे रोगों और चोटों से राहत दें )

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

( जय हनुमानआप ज्ञान और गुण के सागर हैं जय हो बंदरों के राजा कीवह जिनकी चमक तीनो लोक उज्ज्वल करती है )

राम दूत अतुलित बल धामा अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

( वह राम के प्रिय दूत हैं और अनंत शक्ति के स्वामी हैं वह अंजनी देवी और पवन(वायु देव) के पुत्र हैं )

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

( आप महावीर हैं, महान कर्मों के कर्ता हैं और आपका शरीर हीरे जैसा मजबूत है आप विनाशकारी विचारों से छुटकारा देते हैं, और मन को रचनात्मक विचारों से भर देते हैं )

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥

( आपकी त्वचा सुनहरे रंग कि है और आप प्रभावशाली वस्त्र पहनते हैं आप कान में बाली पहनते हैं और आपके लंबे बाल हवा में लहराते है )

हाथ बज्र ध्वजा बिराजै काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

( आपके एक हाथ में वज्र की शक्ति वाला गदा और दुसरे हाथ में झंडा है आपका कंधों एक पवित्र मुंज घास से बने धागे से सजा हुआ है )

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

( आप भगवान शिव के अवतार रूप हैं, आप राजा केसरी के बेटे हैं आपके महिमा की पूरी दुनिया में पूजा की जाती है )

बिद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

( आप महान विद्या, सराहनीय गुणों और उच्चतम ज्ञान के अधिकारी हैं आप हमेशा बड़े उत्साह के साथ भगवान राम के काम करने के लिए उपस्थित रहते हैं )

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

( जब आप भगवान राम की महिमा के बारे में सुनते है तब आप खुशी से उत्तेजित हो जाते हैं आपके लिए भगवान राम, उनके भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के दिलों में एक खास जगह है )

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

( एक छोटासा रूप लेकर आप माता सीता को मिल आये फिर एक बड़ेसे रूप में बदलकर, आपने लंका को आग में नष्ट किया )

भीम रूप धरि असुर सँहारे रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥
( एक भयानक रूप में, आपने राक्षसों को नष्ट कर दिया, और आसानी से भगवान राम के सभी काम में कामयाब हुए )

लाय सञ्जीवन लखन जियाये श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

( आप लक्ष्मण को सजीव करने के लिए संजीवनी जड़ी बूटी लाए और रघु कबीले के बहादुर योद्धा, श्री राम ने खुशी और राहत के साथ, आपको गले लगा लिया )

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

( भगवान राम ने आपकी लगातार प्रशंसा की और घोषणा की कि आप उनको अपने भाई भरत जितने प्रिय थे )

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

( शेषनाग हमेशा अपने हजार सिरों से तुम्हारे भजन गायेगा यह कहते हुए देवी लक्ष्मी के पति विष्णु के अवतार, भगवान राम ने आपको गले लगाया )

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

बाबा संक, भगवान ब्रह्मा और कई अन्य संत नारद मुनि, देवी सरस्वती और कई अन्य संत )

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

( भगवान यम, भगवान कुबेर (खजाने के भगवान) और विभिन्न दिक्पाल यहाँ तक कि कवि और गायक भी आपकी महिमा के वर्णन के साथ न्याय नहीं कर सकते )

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

( आपने राजा सुग्रीव पे एक उपकार किया उसकी भगवान राम से भेंट कराकर उसे अपने राज्य को पाने में मदद की )

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

( रावण के भाई विभीषण ने आपकी सलाह को स्वीकार कर लिया नतीजतन वह लंका का राजा बनने में सफल रहा और उसी रूप में वो पूरी दुनिया में जाना जाता है )

जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

( सूर्य जो पृथ्वी से बहुत दूर खड़ा है आपने उसको निगल लिया था ये धारणा के साथ कि यह आकाश में एक मीठा फल था )

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

( अपने मुंह में भगवान राम की अंगूठी का भार उठाते हुए आप समुद्र को लांघ कर लंका तक पहुंचे इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं है )

दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

( जो भी जटिल कार्य इस दुनिया में मौजूद हैं वे आपके अनुग्रह से आसान हो जाते हैं )

राम दुआरे तुम रखवारे होत आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

( आप उस द्वार के संरक्षित है जो कि भगवान राम की ओर जाता है और कोई भी आपकी अनुमति के बिना यह द्वार को पार नहीं कर सकता )

सब सुख लहै तुह्मारी सरना तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

( जो भी आपकी शरण लेने के लिए आता है, उसे सभी खुशीयां प्राप्त हैं जो लोग आपके द्वारा संरक्षित हैं उन्हें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है )

आपन तेज सह्मारो आपै तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

( केवल आप ही हैं जो उस त्रुटिहीन ऊर्जा को नियंत्रित कर सकते हैं जिसके सामने तीनों लोक डर से कांपते हैं )

भूत पिसाच निकट नहिं आवै महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

( भूत और बुरी आत्माएं पास नहीं आती हैं जब भी कोई अपका नाम पुकारता है )


नासै रोग हरै सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

( सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और सभी दर्द भंग हो जाते हैं जब भी कोई भक्त लगातार बहादुर भगवान हनुमान के नाम को दोहराता है )

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

( भगवान हनुमान सभी प्रकार के मुसीबतों से रक्षा करते है उसकी जो अपने मन, कार्यों और शब्दों के साथ उनपे ध्यान करता हैं )

सब पर राम तपस्वी राजा तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

( भगवान राम सभी के राजा हैं, यहां तक कि ऋषियों और संतों के भी और उनके सब काम का ध्यान आप ही ने रखा है, हे भगवान हनुमान )

और मनोरथ जो कोई लावै सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

( जो कोई भी आपके सामने अपने मन की इच्छाओं को व्यक्त करता है, हे भगवान हनुमान अपने जीवन में वह सब प्रयासों के लिए अनंत फल प्राप्त करने में सक्षम होता है )

चारों जुग परताप तुह्मारा है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

( आपकी महिमा समय के चार युग भर में फैली हुई है और आपकी प्रसिद्धि पूरी दुनिया को रोशनी देती है )

साधु सन्त के तुम रखवारे असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

( आप संतों और ऋषियों के रक्षक हैं आप राक्षसों के नाशक और भगवान राम के प्यारे हैं )

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

आप अलौकिक शक्तियों के आठ रूपों और खजाने के नौ प्रकार के संभाजक हैं और माँ जानकी (सीताभगवान राम की पत्नी) ने उन क्षमताओं को पाने का आपको आशीर्वाद दिया था )

राम रसायन तुह्मरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

भगवान राम की भक्ति का रहस्य आपके पास है आप हमेशा ही उनके सेवा में रहेंगे )

तुह्मरे भजन राम को पावै जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

आपकी प्रशंसा में गाए हुए गाने भगवान राम को भी खुश कर देते हैं और वह कई जन्मों के सभी दर्द को हटा देते हैं )

अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

( जो भी आपकी प्रशंसा में गाने गाता है, उसे अपने जीवन के अंत में भगवान राम के निवास में शरण मिलता है और उस जगह में जन्म लेने वाले हर प्राणी को, हरि के भक्त के रूप में पहचाना जाता है )

और देवता चित्त धरई हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

( यहां तक कि कोई अगर अन्य देवताओं की पूजा ना भी करे वह सिर्फ भगवान हनुमान की सेवा करके सभी सुख प्राप्त कर सकता हैं )

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

( कठिनाइयाँ गायब हो जाती हैं और सभी दर्द भंग हो जाते हैं उसके लिए जो मजबूत और बहादुर भगवान हनुमान पर ध्यान करता है )

जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

( जय, जय, जय हो आपकी, भगवान हनुमान कृपया मुझे अपनी दया दिखाएँ, बस एक शिक्षक (गुरु) की तरह )

जो सत बार पाठ कर कोई छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

( जो कोई भी इस प्रार्थना का पाठ एक सौ बार करेगा वो सभी बंधनों से मुक्त हो जायेगा और बड़ी खुशियों को प्राप्त करेगा )

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

( जो कोई भी इस हनुमान चालीसा को पढ़ेगा उसे पूर्णता प्राप्त होगीदेवी गौरी के पति (भगवान शिव) इस के गवाह हैं )

तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

( तुलसीदास जो हमेशा के लिए हरि (तथा भगवान राम) के भक्त है वह आपसे निवेदन करता है की आप उसके दिल में निवास लें )

॥दोहा॥


पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप


( हे भगवान हनुमानपवन के पुत्र और कठिनाइयों के हर्ता जिनका रूप अत्यधिक शुभ और दिव्य है भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ कृपया मेरे दिल में निवास लें )







सोमवार, 13 नवंबर 2017

महामृत्युंजय मंत्र कथा

निरंजन निराकर महेश्वर ही एक मात्र महादेव है जो मृत्यु के मुख में गए हुए प्राण को बल पूर्वक निकलकर उसकी रक्षा करते है ! मर्काण्ड ऋषि का पुत्र मार्कण्डेय अलप आयु था ! ऋषियों ने उसे शिव मंदिर में जा कर महामृत्युंजय मंत्र की सममिति प्रदान की ! मार्कण्डेय ऋषियों के वचनो में श्रद्धा रख कर शिव मंदिर में महामृत्युंजय मंत्र के जाप का यथा विधि जाप करने लगे ! समय पर यमराज आए किन्तु मृतुन्जय की शरण में गए हुए को कौन छू सकता है ! यमराज लौट गए ! मार्कण्डेय ने दीर्घ आयु पाई और मार्कण्डेय ने मार्कण्डेय पुराण की रचना भी की!

ॐ मृतुन्जय महादेव तर्हिमान शरणागता
जन्म मृत्यु जरा रो गई पिडिदम कर्मबंदनी


हे मृतुन्जय महादेव मैं सांसारिक दुविधा में फसा हुआ हूँ रोग और मृत्यु मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे है मैं आपकी शरण में हूँ मेरी रक्षा कीजिये!

महामृत्युंजय मंत्र महा मंत्र  है जिसकी यथा विधि प्रयाण से  व्यक्ति पापो से छूट कर सुख समृद्धि प्राप्त करता है! इस लोक में न न प्रकार के कष्टों से मृत्यु भय से मुक्त हो कर सम्पत रिद्धि सीधी को प्राप्त करने का सरल उपाय महामृत्युंजय मंत्र ही है!

शनिवार, 11 नवंबर 2017

मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग




कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि पहले किसका विवाह होगा. जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय जब विवाद में किसी हल पर नहीं पहुंच पायें तो दोनों अपना- अपना मत लेकर भगवान शंकर और माता पार्वती के पास गए.

अपने दोनों पुत्रों को इस प्रकार लडता देख, पहले माता-पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की. परन्तु जब वे किसी भी प्रकार से गणेश और कार्तिकेयन को समझाने में सफल नहीं हुए, तो उन्होने दोनों के समान एक शर्त रखी. दोनों से कहा कि आप दोनों में से जो भी पृ्थ्वी का पूरा चक्कर सबसे पहले लगाने में सफल रहेगा. उसी का सबसे पहले विवाह कर दिया जायेगा. 

विवाह की यह शर्त सुनकर दोनों को बहुत प्रसन्नता हुई. कार्तिकेयन का वाहन क्योकि मयूर है, इसलिए वे तो शीघ्र ही अपने वाहन पर सवार होकर इस कार्य को पूरा करने के लिए चल दिए. परन्तु समस्या श्री गणेश के सामने आईं, उनका वाहन मूषक है., और मूषक मन्द गति जीव है. अपने वाहन की गति का विचार आते ही श्री गणेश समझ गये कि वे इस प्रतियोगिता में इस वाहन से नहीं जीत सकते. श्री गणेश है. चतुर बुद्धि, तभी तो उन्हें बुद्धि का देव स्थान प्राप्त है, बस उन्होने क्या किया, उन्होनें प्रतियोगिता जीतने का एक मध्य मार्ग निकाला और, शास्त्रों का अनुशरण करते हुए, अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करनी प्रारम्भ कर दी. 

शास्त्रों के अनुसार माता-पिता भी पृ्थ्वी के समान होते है. माता-पिता उनकी बुद्धि की चतुरता को समझ गये़. और उन्होने भी श्री गणेश को कामना पूरी होने का आशिर्वाद दे दिया.

 शर्त के अनुसार श्री गणेश का विवाह सिद्धि और रिद्धि दोनों कन्याओं से कर दिया गया. पृ्थ्वी की प्रदक्षिणा कर जब कार्तिकेयन वापस लौटे तो उन्होने देखा कि श्री गणेश का विवाह तो हो चुका है. और वे शर्त हार गये है. श्री गणेश की बुद्धिमानी से कार्तिकेयन नाराज होकर श्री शैल पर्वत पर चले गये़ श्री शैल पर माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयन को समझाने के लिए गई और भगवान शंकर भी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में अपनी पुत्र से आग्रह करने के लिए पहुंच गयें. 

उसी समय से श्री शैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई, और इस पर्वत पर शिव का पूजन करना पुन्यकारी हो गया.