रविवार, 10 जून 2018

भोलेनाथ के 9 प्रतीकों का रहस्य



 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव रूप अनेकों प्रतीकों का योग है। भोलेनाथ के शरीर पर हर एक आभूषण का एक विशेष प्रभाव तथा महत्व है। भगवान के इन प्रतीकों में कई सारे रहस्य छुपे हुए है जिन्हे आप अवश्य ही जानना चाहेंगे। आईये जानते है इसके पीछे का सत्य।

भगवान शिव के 9 प्रतीक


भगवान शिव के नौ प्रतीक हैं। उनके आस-पास का हर एक वस्तु या उनके शरीर का आभूषण कोई न कोई सन्देश देता है। आइए, साल 2018 में महाशिवरात्रि के मौक़े पर जानते हैं रुद्र से जुड़े 9 प्रतीकों को–

पैरों में कड़ामृगछालारुद्राक्षनागदेवताखप्परडमरूत्रिशूलशीश पर गंगाचन्द्रमा

शिव जी के नौ प्रतीकों का महत्व, रहस्य और प्रभाव।

  • पैरों में कड़ा – शिवजी के पैरों में कड़ा अपने स्थिर तथा एकाग्रता सहित सुनियोजित चरणबद्ध स्थिति को दर्शाता है। योगीजन और अघोरी भी शिव की तरह अपने एक पैर में कड़ा धारण करते है।

  • मृगछाल – मृगासन या मृगछाल के आसन को साधना और तपस्या के लिए श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इस पर बैठ कर साधना का प्रभाव बढ़ता है। यही नही इस पर बैठने से मन की अशांति और अस्थिरता दूर होती है।

  • रुद्राक्ष– यह एक फल की गुठली है जिसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। कहा जाता है इसकी उत्पत्ति भगवान शिव के आँखों से निकले हुए आंसू से हुई थी। इसे धारण करने से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

  • नागदेवता – जब अमृत मंथन हुआ था तब अमृत कलश के पूर्व विष को भोलेनाथ ने अपने कंठ में रखा था। विकार की अग्नि को दूर करने के लिए शिव जी ने विषैले सांपों की माला को पहना।

  • खप्पर– भगवान भोलेनाथ ने समस्त प्राणियों की क्षुधा को शांत करने के लिए माता अन्नपूर्णा से भीख मांगी थी। इसका अर्थ यह है कि अगर आपसे किसी का भला होता है तो अवश्य ही उसकी मदद करनी चाहिए।

  • डमरू – यह संसार का सबसे पहला वाघ है। क्योंकि इससे वेदों के शब्दों की उत्पत्ति हुई थी इसलिए इसे नाद ब्रहम या स्वर ब्रह्म कहा गया है।

  • त्रिशूल – यह संसार का सबसे परम तेजस्वी अस्त्र है जिसमे माता जगदंबा की परम शक्ति है। त्रिशूल से ही सारे राक्षसों का अंत किया गया है। इसमें राजसिक, तामसिक और सात्विक तीनों ही गुण समाहित है।

  • शीश पर गंगा – भगवान शिव ने गंगा को अपने जटाओं में बाँध कर यह सन्देश दिया है कि आवेग की अवस्था को दृढ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है।

  • चन्द्रमा – चन्द्रमा आभा, प्रज्वल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है, जिससे मन में शुभ विचार उत्पन्न होते हैं। अपनी इन्ही अच्छे विचारों और सकारात्मक सोच के साथ मनुष्य आगे बढ़े और समस्त संसार का कल्याण हो।

मंगलवार, 5 जून 2018

आदि शक्ति ( देवी सती ) के 52 शक्ति पीठ







आदि शक्ति ( देवी सती ) के 52 शक्ति पीठ

1 - अट्टहास शक्तिपीठ (बीरभूम,पश्चिम बंगाल) होंठ
2 - बहुला शक्तिपीठ (बर्दवान,पश्चिम बंगाल ) बाया बाहु
3 - बाकरेशवर शक्तिपीठ (बीरभूम,पश्चिम बंगाल) मन
4- कालीपीढ शक्तिपीठ (कालीगढ,पश्चिम बंगाल) बाएं पैर की ऊंगलिया
5 - कंकालेशवरी शक्तिपीठ (बीरभूम,पश्चिम बंगाल) हडियां
6 - किरीट शक्तिपीठ ( मुरशिदाबाद, पश्चिम बंगाल ) मुकुट
7 - आनंदमय शक्तिपीठ ( हुगली, पश्चिम बंगाल ) दायिना कंधा
8 - नंदीकेशवरीय शक्तिपीठ (बीरभूम,पश्चिम बंगाल) कण्ठहार
9 - उज्जैनी शक्तिपीठ ( बर्दवान, पश्चिम बंगाल ) कुहनी
10 - विभाष शक्तिपीठ (मेदिनीपुर,पश्चिम बंगाल) बाया टखना
11- जुगादया शक्तिपीठ (बर्दवान,पश्चिम बंगाल) दाहिने पैर का अंगूठा
12 - भरमरी शक्तिपीठ (जलपायगुडी,पश्चिम बंगाल) बाया पैर
13- ज्वालामुखी शक्तिपीठ ( कांगडा, हिमाचल प्रदेश ) जीभ
14 - नैना देवी शक्तिपीठ ( बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ) नयन
15 - चिंतामणी शक्तिपीठ ( उना, हिमाचल प्रदेश ) दोनो पैर
16 - करनाट शक्तिपीठ ( कांगडा, हिमाचल प्रदेश ) दोनों कान
17 - कात्यायनी शक्तिपीठ ( वृंदावन, उतर प्रदेश ) केशपाश
18- आलोपी शक्तिपीठ ( इलाहाबाद ,उत्तर प्रदेश ) हाथ की अंगुलियों
19- चित्रकूट शक्तिपीठ ( झांसी, उत्तर प्रदेश) दाहिना सतन
20- मणिकर्णिका शक्तिपीठ ( वाराणसी, उत्तर प्रदेश ) दाहिने कान की मणि
21- गंडकालिका शक्तिपीठ ( उज्जैन, मध्य प्रदेश) उफध्र्व ओष्ठ
22- काल माधव शक्तिपीठ ( अमरकंटक,मध्य प्रदेश ) वाम नितम्ब
23- शोण शक्तिपीठ ( अमरकंटक,मध्यप्रदेश ) दक्षिण नितम्ब
24 - शिरिसेलम शक्तिपीठ ( करनूल, आंध्र प्रदेश ) ग्रीवा
25 - कुटीलिगंशेवर शक्तिपीठ (राजमुंदरी,आंध्र प्रदेश ) दाया टखना
26- अंबा जी शक्तिपीठ ( बनस कंठ, गुजरात ) दिल
27 - प्रभास शक्तिपीठ ( जुनागड, गुजरात ) उदर
28- कन्या श्रम शक्तिपीठ ( कन्याकुमारी, तमिलनाडु ) पीठ
29 - सुच्चिदंरम शक्तिपीठ ( कन्याकुमारी, तमिलनाडु ) उफध्र्वदन्त
30 - दंतेशवरी शक्तिपीठ ( दंतेवाडा, छत्तीसगढ ) नीचे के दांत
31 -चामुंडा शक्तिपीठ ( पुष्कर,राजस्थान ) कलाइयाँ
32 - विराट अम्बिका शक्तिपीठ ( भरतपुर, राजस्थान ) दाये पाव की ऊंगलियों
33 - बिराजा शक्तिपीठ, (याजपुर, उडीसा ) नाभि
34 -थानेशर शक्तिपीठ ( कुरुक्षेत्र, हरियाणा ) दाहिने चरण की हड्डी
35 -त्रिपुरी शक्तिपीठ ( राध किशोर ग्राम त्रिपुरा ) दक्षिण पाद
36- जालंधर शक्तिपीठ ( जालंधर, पंजाब ) बाया स्तन
37 - पटनेशवरी शक्तिपीठ ( पटना,बिहार ) दाहिनी जंघा
38 - वैघनाथ शक्तिपीठ ( देवघर, झारखंड ) हृदय
39 - कामख्या शक्तिपीठ ( गुवाहाटी, आसाम ) योनी
40- भद्रकाली शक्तिपीठ (नासिक, महाराष्ट्र ) ठुड्डी
41 -नरतिंयाग शक्तिपीठ (जंयती पहाडी, मेघालय ) बाया जंघा
42- अमरनाथ शक्तिपीठ, ( पहलगांव, कशमीर ) कंठ
43- मिथिला शक्तिपीठ ( जनकपुर, नेपाल ) वाम स्कंध्
44 - गोहयेशवरी शक्तिपीठ ( पशुपतिनाथ,नेपाल ) दोनो घुटने
45 - गंडकी शक्तिपीठ ( पोखरा, नेपाल ) कपोल
46 -हिंगलाज शक्तिपीठ ( बलुचिस्तान, पाकिस्तान ) सिर का उपरी भाग
47 - भभानीपुर शक्तिपीठ ( शेरपुर, बांग्लादेश ) बाया टखना
48- सुंगध शक्तिपीठ ( खुलना, बांग्लादेश) नासिका
49 - यशोरेशवरी शक्तिपीठ ( खुलना बांग्लादेश ) बायीं हथेली
50 - चट्टल शक्तिपीठ ( चिंटगाव, बांग्लादेश ) दाहिना बाहु
51 - लंका शक्तिपीठ ( श्रीलंका ) नुपुर, घुँघरू
52- मानस शक्तिपीठ ( मानसरोवर, तिब्बत) दाहिना हथेली का निपात


ये सारे वो स्थान है, जहाँ देवी सती की मृत्यु के पश्चात्‌ उनके अंग और आभुषण गिरे थे।

सोमवार, 28 मई 2018

शिवजी की पूजा-अर्चना में रखें छोटी-छोटी सावधानी



शिवलिंग पर जलाभिषेक लोटे के जल से पतली धार गिराते हुए करना चाहिए. बहुत से लोग एक झोंके में लोटाभर पानी उडेल देते हैं. यह अनुचित विधि है. पतली धार से जल गिराते हुए ऊँ नमः शिवाय का उच्चारण करते रहें.

शिवजी का किसी भी पदार्थ से अभिषेक करने के बाद अंत में जलाभिषेक अवश्य करना चाहिए. जलाभिषेक बाद शिवलिंग को स्पर्शकर प्रणाम करना चाहिए. उदाहरण के लिए यदि आपने दूध से अभिषेक किया तो उसके बाद जल से अभिषेक जरूर कर दें.

शिवजी की स्थापना जहा गर्भगृह में हुई हो वही उत्तम मानी जाती है. गर्भगृह उसे भी माना जा सकता है यदि शिवलिंग के ऊपर शंकुल आकार की छत बनी हो.

शिवजी पर चढ़े निर्माल्य का उल्लंघन न करें यानी लांघें नहीं.


जो लोग आर्थिक रूप से बहुत संकट में चल रहे हैं. जीवनयापन की बाधा आ रही हो उन्हें प्रतिदिन शिवमंदिर में शिव-दारिद्रय-दहन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. यह अनेक लोगों पर आजमाया हुआ प्रयोग है और इससे शर्तिया लाभ होता ही है. इसके पाठ से आजीविका का संकट तो अवश्य समाप्त होता है. यह नहीं  कि खूब धन-दौलत आ जाएगी, हो सकता है विपुल संपदा आ भी जाए पर यह बात पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि जीवनयापन की बाधा का निदान हो जाता है. बहुत से लोगों को बताया गया और सभी को लाभ हुआ है. दारिद्रय दहन स्तोत्र का पाठ आरंभ करने के लिए सावन मास उपयुक्त समय है.


आरती के अलावा कभी भी मंदिर में बहुत जोर-जोर से और बार-बार घंटा न बजाएं. घंटा बस एक बार बजाना चाहिए.


आरती के समय बैठना या लेटना नहीं चाहिए, इससे देवताओं का अपमान होता है. यदि आप घर में हैं और आरती हो रही है तो उतनी देर के लिए ही सही उठकर खड़े अवश्य हो जाएं. यदि मंदिर में हैं तो भी आरती के समय अपनी पूजा-जप आदि बंद करके खड़े होकर आरती में शामिल हों.


पूजा यदि नियम से की जाए तो पूजा का फल बढ़ जाता है. बिलकुल वैसे ही जैसे आप किसी भी काम को व्यस्थित तरीके से करते हैं तो उससे काम की सुंदरता बढती है और सफलता की संभावना ज्यादा रहती है. पूजा के नियम इतने कठिन भी नहीं है कि उनका पालन न किया जा सकें.


पूजा के नियम बनाने के पीछे बहुत से व्यवहारिक कारण हैं. आप इन्हें जानेंगे तो स्वयं ही इसका पालन करने लगेंगे.

मंगलवार, 15 मई 2018

भगवान भोलेनाथ की उपासना के उपाय, सिद्ध मंत्रों का करें जाप, शीघ्र प्रसंन्न होंगे भगवान शिव


भगवान भोलेनाथ को देवों के देव महादेव कहे जाते हैं। पुराणों में उल्लेख है कि जब ब्रम्हांड की संपूर्ण शक्ति या सारे देवता हार मान जाते हैं तो भोले बाबा ही उसका उपाय सुझाते हैं। शिवजी की आराधना बड़ी ही लाभकारी है। पुराणों में यहां तक उल्लेख है कि एक लोटा जल चढ़ाने मात्र से भोलेबाबा प्रसन्न हो जाते हैं और मनवांछित फल देते हैं। भगवान शिव शाम प्रकृति एवं रुद्रों के लिए भी जाने जाते हैं। देवताओं में शिवजी को एकदम अलग पाया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति एवं संहार के भी यह आधिपति कहे गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदेश कर्ता हैं। ये कालों के काल महाकाल एवं ज्योतिष शास्त्र के आधार हैं। महा अघोरी और तंत्र मंत्र के रचयिता भी हैं। यह तंत्र को और अघोरियों की भी परम आराध्य हैं इनके अनेकों अवतार हैं। हम आपको बताते हैं भगवान शिव को प्रसन्न करने के सबसे सरल एवं सिद्ध किए हुए मंत्र।

इन्हें देवों का देव महादेव भी कहा जाता है। शिवजी की आराधना का मूल मंत्र तो "ॐ नम: शिवाय " ही है। लेकिन इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं जिनसे भगवान शिव बेहद प्रसन्न हो जाते हैं।

🕉 शिव पंचाकशरी स्त्रोतम 🕉
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥
शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

🕉 स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए शिवजी के मंत्र 🕉
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।।
कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।।

🕉 शिव ध्यान मंत्र 🕉
ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,रत्नाकलोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नं।
पद्माशीनं समन्तात स्तुरिममरगणेव्यार्घृतिं वसानं,विश्ववाध्यं विश्ववन्द्यम निखिल भहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥
स्वच्छ स्वर्णपयोदं भतिकजपावर्णेभिर्मुखे: पंचभि:,त्र्यक्षरैचितिमीशमिन्दुमुकुटं सोमेश्वराख्यं प्रभुम।
शूलैटंक कृपाणवज्रदहनान-नागेन्द्रघंटाकुशान,पाशं भीतिहरं उधानममिताकल्पोज्ज्वलांग भेजे॥

🕉 ध्यान करें 🕉
वन्दे देव उमापतिं सुरुगुरु वन्दे जगत्कारणम,
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनांपतिम।
वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनं वन्चे मुकुन्दप्रिय:,
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवशंकरम॥
शान्तं पदमासनस्थं शशिधर मुकुटं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम,
शूलं वज्र च खडग परशुमभयदं दक्षिणागे वहन्न्तम।
नाग पाशं च घंटां डमरूकसहितं सांकुशं वामभागे,
नानालंकार दीप्तं स्फ़टिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि॥
कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारम,
सदा बसन्तं ह्रदयार विन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥

🕉 नमस्कार 🕉
ऊँ नम: शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।
तव तत्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादशोसि महादेव तादृशाय नमोनम:॥
त्रिनेत्राय नमज्ञतुभ्यं उमादेहार्धधारिणे।
त्रिशूल धारिणे तुभ्यं भूतानां पतये नम:॥
गंगाधर नमस्तुभ्यं वृषमध्वज नमोस्तु ते।
आशुतोष नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नम:॥

🕉 शिव मूल मंत्र 🕉
ॐ नमः शिवाय

महामृत्युंजय मंत्र 🕉
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनानत् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

🕉 मृत संजीवनी महामृत्युञ्जय मंत्र 🕉
ऊँ हौं जूं स: ऊँ भुर्भव: स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ऊँ भुव: भू: स्व: ऊँ स: जूं हौं ऊँ

🕉 रुद्र गायत्री मंत्र 🕉
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

🕉 रुद्रशतकम 🕉
नमामिशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाश माकाश वासं भजेयम।।
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं। गिराज्ञान गोतीत मीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसार पारं नतोहं।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूति कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
स्फुरंमौली कल्लो लीनिचार गंगा। लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा।।
चलत्कुण्डलं भू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननम नीलकंठं दयालं।।
म्रिगाधीश चर्माम्बरम मुंडमालं। प्रियम कंकरम सर्व नाथं भजामि।।
प्रचंद्म प्रकिष्ट्म प्रगल्भम परेशं। अखंडम अजम भानु कोटि प्रकाशम।।
त्रयः शूल निर्मूलनम शूलपाणीम। भजेयम भवानी पतिम भावगम्यं।।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्ज्नानंद दाता पुरारी।।
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
न यावत उमानाथ पादार विन्दम। भजंतीह लोके परे वा नाराणं।।
न तावत सुखं शान्ति संताप नाशं। प्रभो पाहि आपन्न मामीश शम्भो ।

शिव ताण्डव स्तोत्र 🕉
जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्ग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥
जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शुक्रवार, 4 मई 2018

भगवान भोलेनाथ के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक ज्योर्तिलिंग है - केदारनाथ ज्योतिर्लिग






केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।

भगवान भोलेनाथ के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक ज्योर्तिलिंग है केदरनाथ जो उत्तराखंड की देव भूमि में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग को आधा ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है क्योंकि इसका एक भाग भारत के पड़ोसी राज्य नेपाल के काठमांडू में स्थित है। काठमांडू स्थिति केदारनाथ का भाग पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाता है।

पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में पाण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान भोलेनाथ पाण्डवों से नाराज हो गये। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पाण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। गुप्त काशी में पाण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थिति है।


शिव जी का पीछा करते हुए पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पाण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक भैंसे का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे भैसों के झुण्ड में शामिल हो गये। पाण्डवों ने भैसों के झुण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तब शिव जी भैंस के रूप में ही भूमि समाने लगे। भीम ने भैंस को कसकर पकड़ लिया।

भगवान शिव प्रकट हुए और पाण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच भैंस बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुपात नाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में भैंस के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति बद्रीनाथ और केदारनाथ का दर्शन करता है वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

नेपाल स्थित पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि जो व्यक्ति पतिपति नाथ के दर्शन करता है उसका जन्म कभी भी पशु योनी में नहीं होता है। जनश्रुति यह भी है कि, इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय भक्तों को मंदिर के बाहर स्थित नंदी का प्रथम दर्शन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति पहले नंदी का दर्शन करता है बाद में शिवलिंग का दर्शन करता है उसे अगले जन्म पशु योनी मिलती है।

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

अमरनाथ धाम से जुडी शिव-पार्वती कथा




एक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर हैं लेकिन मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर, फिर से बरसों तप के बाद आपको प्राप्त करना होता है । जब मुझे आपको पाना है तो मेरी तपस्या और इतनी कठिन परीक्षा क्यों? आपके कंठ में पडी़ नरमुंड माला और अमर होने के रहस्य क्या हैं?

महादेव ने पहले तो देवी पार्वती के उन सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझा, लेकिन पत्नीहठ के कारण कुछ गूढ़ रहस्य उन्हें बताने पडे़। शिव महापुराण में मृत्यु से लेकर अजर-अमर तक के कर्इ प्रसंंग हैं, जिनमें एक साधना से जुडी अमरकथा बडी रोचक है। जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं।

हर वर्ष हिम के आलय (हिमालय) में अमरनाथ, कैलाश और मानसरोवर तीर्थस्थलों में लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। सैकडों किमी की पैदल यात्रा करते हैं, क्यों? यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा। शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास तक की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तों को खुद से जुडे रहस्यों के कारण और प्रासंगिक लगती है।

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार, अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पार्वती को अमर होने के गुप्त रहस्य बतलाए थे, उस दौरान उन ‘दो ज्योतियों’ के अलवा तीसरा वहां कोर्इ प्राणी नहीं था । न महादेव का नंदी और नही उनका नाग, न सिर पे गंगा और न ही गनपति, कार्तिकेय….!


सबसे पहले नंदी को पहलगाम पर छोड़ा महादेव ने

गुप्त स्थान की तलाश में महादेव ने अपने वाहन नंदी को सबसे पहले छोड़ा, नंदी जिस जगह पर छूटा, उसे ही पहलगाम कहा जाने लगा। अमरनाथ यात्रा यहीं से शुरू होती है। यहां से थोडा़ आगे चलने पर शिवजी ने अपनी जटाओं से चंद्रमा को अलग कर दिया, जिस जगह ऐसा किया वह चंदनवाडी कहलाती है। इसके बादगंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा।


अगले पड़ाव पर गणेश छूटे

अमरनाथ यात्रा में पहलगाम के बाद अगला पडा़व है गणेश टॉप, मान्यता है कि इसी स्थान पर महादेव ने पुत्र गणेश को छोड़ा। इस जगह को महागुणा का पर्वत भी कहते हैं। इसके बाद महादेव ने जहां पिस्सू नामक कीडे़ को त्यागा, वह जगह पिस्सू घाटी है।


और शुरू हुर्इ शिव-पार्वती की कथा

इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को स्वंय से अलग किया। इसके पश्चात् पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया। कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी। फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कथा सुनते-सुनते सो गर्इं पार्वती, कबूतरों ने सुनी

कहा जाता है कि कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गर्इ, वह सो गर्इं और महादेव को यह पता नहीं चला, वह सुनाते रहे। यह कथा इस समय दो सफेद कबूतर सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। महादेव को लगा कि पार्वती मुझे सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। चूंकि वैसे भी भोले अपने में मग्न थे तो सुनाने के अलावा ध्यान कबूतरों पर नहीं गया।

वे कबूतर अमर हुए और अब गुफा में होते हैं उनके दर्शन

दोनों कबूतर सुनते रहे, जब कथा समाप्त होने पर महादेव का ध्यान पार्वती पर गया तो उन्हें पता चला कि वे तो सो रही हैं। तो कथा सुन कौन रहा था? उनकी दृष्टि तब दो कबूतरों पर पड़ी तो महादेव को क्रोध आ गया। वहीं कबूतर का जोड़ा उनकी शरण में आ गया और बोला, भगवन् हमने आपसे अमरकथा सुनी है। यदि आप हमें मार देंगे तो यह कथा झूठी हो जाएगी, हमें पथ प्रदान करें। इस पर महादेव ने उन्हें वर दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव व पार्वती के प्रतीक चिह्न में निवास करोगे। अंतत: कबूतर का यह जोड़ा अमर हो गया और यह गुफा अमरकथा की साक्षी हो गर्इ। इस तरह इस स्थान का नाम अमरनाथ पड़ा।

मान्यता है कि आज इन दो कबूतरों के दर्शन भक्तों को होते हैं। अमरनाथ गुफा में यह भी प्रकृति का ही चमत्कार है कि शिव की पूजा वाले विशेष दिनों में बर्फ के शिवलिंग अपना आकार ले लेते हैं। यहां मौजूद शिवलिंग किसी आश्चर्य से कम नहीं है। पवित्र गुफा में एक ओर मां पार्वती और श्रीगणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन किए जा सकते हैं।