मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

कृष्ण-सुदामा की मित्रता



कृष्ण-सुदामा की मित्रता बहुत प्रचलित है। सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। अपने बच्चों का पेट भर सके उतने भी सुदामा के पास पैसे नहीं थे। सुदामा की पत्नी ने कहा, "हम भले ही भूखे रहें, लेकिन बच्चों का पेट तो भरना चाहिए न ?" इतना बोलते-बोलते उसकी आँखों में आँसू आ गए। सुदामा को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कहा, "क्या कर सकते हैं ? किसी के पास माँगने थोड़े ही जा सकते है।" पत्नी ने सुदामा से कहा, "आप कई बार कृष्ण की बात करते हो। आपकी उनके साथ बहुत मित्रता है ऐसा कहते हो। वे तो द्वारका के राजा हैं। वहाँ क्यों नहीं जाते ? जाइए न ! वहाँ कुछ भी माँगना नहीं पड़ेगा !"

सुदामा को पत्नी की बात सही लगी। सुदामा ने द्वारका जाने का तय किया। पत्नी से कहा, "ठीक है, मैं कृष्ण के पास जाऊँगा। लेकिन उसके बच्चों के लिए क्या लेकर जाऊँ ?"सुदामा की पत्नी पड़ोस में से पोहे ले आई। उसे फटे हुए कपडे में बांधकर उसकी पोटली बनाई। सुदामा उस पोटली को लेकर द्वारका जाने के लिए निकल पड़े।

द्वारका देखकर सुदामा तो दंग रह गए। पूरी नगरी सोने की थी। लोग बहुत सुखी थे। सुदामा पूछते-पूछते कृष्ण के महल तक पहुँचे। दरवान ने साधू जैसे लगनेवाले सुदामा से पूछा, "एय, यहाँ क्या काम है ?"

सुदामा ने जवाब दिया, "मुझे कृष्ण से मिलना है। वह मेरा मित्र है। अंदर जाकर कहिए कि सुदामा आपसे मिलने आया है।" दरवान को सुदामा के वस्त्र देखकर हँसी आई। उसने जाकर कृष्ण को बताया। सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण खड़े हो गए ! और सुदामा से मिलने दौड़े । सभी आश्चर्य से देख रहे थे ! कहाँ राजा और कहाँ ये साधू ?

कृष्ण सुदामा को महल में ले गए। सांदीपनी ऋषि के गुरुकुल के दिनों की यादें ताज़ा की। सुदामा कृष्ण की समृद्धि देखकर शर्मा गए। सुदामा पोहे की पोटली छुपाने लगे, लेकिन कृष्ण ने खिंच ली। कृष्ण ने उसमें से पोहे निकाले। और खाते हुए बोले, "ऐसा अमृत जैसा स्वाद मुझे और किसी में नहीं मिला।"

बाद में दोनों खाना खाने बैठे। सोने की थाली में अच्छा भोजन परोसा गया। सुदामा का दिल भर आया। उन्हें याद आया कि घर पर बच्चों को पूरा पेट भर खाना भी नहीं मिलता है। सुदामा वहाँ दो दिन रहे। वे कृष्ण के पास कुछ माँग नहीं सके। तीसरे दिन वापस घर जाने के लिए निकले। कृष्ण सुदामा के गले लगे और थोड़ी दूर तक छोड़ने गए।

घर जाते हुए सुदामा को विचार आया, "घर पर पत्नी पूछेगी कि क्या लाए ? तो क्या जवाब दूँगा ?"

सुदामा घर पहुँचे। वहाँ उन्हें अपनी झोपड़ी नज़र ही नहीं आई ! उतने में ही एक सुंदर घर में से उनकी पत्नी बाहर आई। उसने सुंदर कपड़े पहने थे। पत्नी ने सुदामा से कहा, "देखा कृष्ण का प्रताप ! हमारी गरीबी चली गई कृष्ण ने हमारे सारे दुःख दूर कर दिए।" सुदामा को कृष्ण का प्रेम याद आया। उनकी आँखों में खूशी के आँसू आ गए।

देखा दोस्तों, कृष्ण और सुदामा का प्रेम यानी सच्चा मित्र प्रेम। तो दोस्तों सच्चे प्रेम में ऊँच या नीच नहीं देखी जाती और न ही अमीरी-गरीबी देखी जाती है। इसीलिए आज इतने युगों के बाद भी दुनिया कृष्ण और सुदामा की दोस्ती को सच्चे मित्र प्रेम के प्रतीक के रूप में याद करती है।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

यहां रखा है भगवान गणेश का कटा हुआ सिर: पाताल भुवनेश्वर की गुफा




 भगवान शिव द्वारा गणेशजी का मस्तक कटे जाने और फिर हाथी का मस्तक लगाने की कथा तो सभी जानते हैं पर क्या आप जानते हैं कि हाथी का मस्तक लगने के बाद गणेशजी के पहले मस्तक का क्या हुआ। यह लेख इसी सवाल का जवाब है। उत्तराखंड के पिथौला में स्थित है पाताल भुवनेश्वर गुफा। यह गुफा एक आश्चर्य है। यह स्थान भक्तों की आस्था का केंद्र है। यह गुफा एक विशाल पहाड़ी में लगभग 90 फुट अंदर स्थित है। यह गुफा उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किमी. की दूरी तय कर मनोरम पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है।




इस गुफा में विराजमान है गणेशजी का कटा मस्तक.
भगवान गणेश हिन्दू धर्म में प्रथम पूज्य देव हैं। भगवान शिव ने क्रोधवश गणेशजी का मस्तक काट दिया। इसके बाद देवी पार्वती के कहने पर भगवन शिव ने गणेशजी के धड़ पर हाथी का मस्तक लगाकर पुनः जीवनदान दिया और कटा हुआ मस्तक इस गुफा में रख दिया।
 
यहां भगवान शिव ने की थी 108 पंखुड़ियों वाले कमल की स्थापना।


यहां स्थित शिलारुपी गणेशजी के सिर के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला ब्रह्मकमल सुशोभित है। यह आश्चर्य से कम नहीं है कि इस कमल से पानी की बूंदें टपकती हैं जो श्री गणेश के मुख में गिरती हैं। यह दृश्य अद्भुत और दिव्य है। कहा जाता है कि यह दिव्य कमल यहां भगवान शिव ने ही स्थापित किया था।

यहां स्थित एक पत्थर बताता है कि कलियुग का अंत कब होगा।
इस गुफा में चार पत्थर स्थित हैं जिन्हें युगों का प्रतीक माना जाता है। इनमें से एक पत्थर जिसे कलियुग का प्रतीक माना जाता है वह धीरे धीरे ऊपर उठ रहा है। कहा जाता है कि जिस दिन यह पत्थर ऊपर दीवार को छू जायेगा तब कलियुग का अंत हो जायेगा।

गुफा में केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ भी स्थित हैं।
इस गुफा की एक विशेषता यह भी है कि यहां केदारनाथ, बद्रीनाथ तथा अमरनाथ के भी दर्शन किये जा सकते हैं। यहां इनकी शिलारुपी प्रतिमायें स्थित हैं। यहां पत्थर से ही निर्मित जटायें भी फैली हुई हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये जटायें भगवान शिव की जटायें हैं। इसी गुफा में कालभैरव की जीभ के भी दर्शन किये जा सकते हैं जिसके बारे में मान्यता है कि यदि मनुष्य काल भैरव के मुख में प्रवेश कर पूंछ तक पहुँच जाये तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

इस गुफा का पौराणिक महत्त्व भी है।
इस गुफा का उल्लेख पुराणों. में मिलता है। स्कन्दपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान हैं और अन्य देवी देवता उनकी स्तुति करने यहाँ आते हैं। यह भी वर्णन है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफ़ा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने इस गुफ़ा के भीतर महादेव शिव सहित 33 कोटि देवताओं के साक्षात दर्शन किये। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलियुग में जगदगुरु आदि शंकराचार्य लगभग 822 ई के आस-पास यहाँ आये तब उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया था।

गुरुवार, 28 मार्च 2019

कैसे हो घर के मंदिर में देवी देवताओं की तस्वीरे और मूर्तियाँ


प्राय सभी हिन्दुओ के घरो में पूजा घर होता है | उसमे वे अपने आराध्य देवी देवताओ की मूर्ति और तस्वीर रखते है | पर कुछ बाते ऐसी है जो घर के मंदिर में ध्यान रखने योग्य होती है जिससे की पूजा का पूर्ण फल आपको मिले | कुछ मुर्तिया या तस्वीर ऐसी भी बताई गयी है जो आपको लाभ की जगह प्रतिकूल फल दे सकती है | आज हम यही विस्तार से जानेंगे की वास्तु के अनुसार घर के मंदिर में मूर्तियाँ कैसी हो |

1. कृष्ण मूर्ति
घर के मंदिर में भगवान कृष्ण की बाल रूप में बैठी हुई मूर्ति रखना उत्तम माना जाता है । कई घरो में लड्डू गोपाल जी स्थापना करके बच्चे की तरह उनका लालन पालन किया जाता है | इसके अलावा मंदिर में कृष्ण राधा की मूर्ति या तस्वीर भी आप लगा सकते है जो खड़ी अवस्था में हो |

2. गणेश
गणेश जी नृत्य करती प्रतिमा या सिंदूरी रंग की मूर्ति रखना अच्छा माना जाता है | इन्हे आप पीले या केसरिया रंग के वस्त्र पहना के रखे |

3. बैठी अवस्था में
पूजा घर में देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और धन के देवता कुबेर की मूर्ति बैठी अवस्था में होनी चाहिए। इन देवताओ का खड़ा रहना घर में इनका स्थाई निवास नही करवाता |

4. भगवान शिव
घर में आप शिव प्रतिमा या फिर रोज जल अभिषेक कर पूजा कर सके तो घर में शिवलिंग की स्थापना करना अच्छा माना जाता है | सबसे अच्छा पारद शिवलिंग को माना गया है |

5. राम दरबार :
परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम के लिए घर में राम दरबार की फोटो का होना अति शुभ माना जाता है जिसमे हनुमान जी राम के चरणों में बैठे हुए हो |

6. दक्षिण मुखी हनुमान
घर में एक पंचमुखी हनुमान जी की फोटो दक्षिण दिशा को देखती हुई लगानी चाहिए | दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यमराज की दिशा बताया जाता है | यदि इस दिशा की तरफ दक्षिणमुखी हनुमान की फोटो होगी तो अकाल मृत्यु से परिवार के सदस्य बचे रहेंगे |

7. भगवान सूर्य की प्रतिमा को घर में लगाना है तो ध्यान रखे यदि सूर्य प्रतिमा ताम्बे की बनी हो तो ज्यादा प्रभावशाली मानी जाती है |

8. विष्णु जी की प्रतिमा घर के मंदिर में हमेशा देवी माँ लक्ष्मी के साथ लगाये क्योकि विष्णु जी तभी घर में कृपा करेंगे जब उनकी जीवनसंगिनी लक्ष्मी जी की फोटो या मूर्ति भी स्थापित हो |

9. तामसिक देवी देवता :
माना जाता है कि तामसिक देवता जैसे काल भैरव , माँ काली , छिन्मस्तिका , बगलामुखी आदि की फोटो या तस्वीर घर में स्थापित नही करे | ये सभी रूद्र देवी देवता है और यदि इन्हे विधि विधान से पूजा अर्चना ना मिले तो जल्दी ही रुष्ट हो जाते है | अगर आप फिर भी रखना चाहते हैं आप किसी गुरु या ज्ञानी की राय लें।

बुधवार, 13 मार्च 2019

भगवान शिव के सामने ही क्यों होती हे नंदी की प्रतिमा



पुराणों में यह कथा मिलती है कि शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की माँग की।

भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया। वन में उसने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।

भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है।

शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिये। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहाँ शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हँस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे।

नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है-

त्वायाहं नंन्दितो यस्मान्नदीनान्म सुरेश्वर।
तस्मात् त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम।।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता ६/४५

अर्थात नंदी के दिव्य स्वरूप को देख शिलाद मुनि ने कहा तुमने प्रगट होकर मुझे आनंदित किया है। अत: मैं आनंदमय जगदीश्वर को प्रणाम करता हूं।

नासिक शहर के प्रसिद्ध पंचवटी स्थल में गोदावरी तट के पास एक ऐसा शिवमंदिर है जिसमें नंदी नहीं है। अपनी तरह का यह एक अकेला शिवमंदिर है। पुराणों में कहा गया है कि कपालेश्वर महादेव मंदिर नामक इस स्थल पर किसी समय में भगवान शिवजी ने निवास किया था। यहाँ नंदी के अभाव की कहानी भी बड़ी रोचक है। यह उस समय की बात है जब ब्रह्मदेव के पाँच मुख थे। चार मुख वेदोच्चारण करते थे, और पाँचवाँ निंदा करता था। उस निंदा से संतप्त शिवजी ने उस मुख को काट डाला। इस घटना के कारण शिव जी को ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी ब्रह्मांड में हर जगह घूमे लेकिन उन्हें मुक्ति का उपाय नहीं मिला। एक दिन जब वे सोमेश्वर में बैठे थे, तब एक बछड़े द्वारा उन्हें इस पाप से मुक्ति का उपाय बताया गया। कथा में बताया गया है कि यह बछड़ा नंदी था। वह शिव जी के साथ गोदावरी के रामकुंड तक गया और कुंड में स्नान करने को कहा। स्नान के बाद शिव जी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो सके। नंदी के कारण ही शिवजी की ब्रह्म हत्या से मुक्ति हुई थी। इसलिए उन्होंने नंदी को गुरु माना और अपने सामने बैठने को मना किया।

आज भी माना जाता है कि पुरातन काल में इस टेकरी पर शिवजी की पिंडी थी। अब तक वह एक विशाल मंदिर बन चुकी है। पेशवाओं के कार्यकाल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। मंदिर की सीढि़याँ उतरते ही सामने गोदावरी नदी बहती नजर आती है। उसी में प्रसिद्ध रामकुंड है। भगवान राम में इसी कुंड में अपने पिता राजा दशरथ के श्राद्ध किए थे। इसके अलावा इस परिसर में काफी मंदिर है। लेकिन इस मंदिर में आज तक कभी नंदी की स्थापना नहीं की गई।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

भगवान शिव ने किया था सुदामा का वध


सुदामा को भगवान श्री कृष्ण के भक्त के रूप में जाना जाता है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता के किस्से बहुत ही विख्यात हैं। लेकिन सुदामा से जुड़ा एक प्रसंग यह भी है कि उनका वध शिव जी ने किया था। इस बात पर विश्वास करना मुश्किल लगता है लेकिन इसका उल्लेख पुराणों में किया गया है।

इस प्रसंग के मुताबिक, स्वर्ग के एक विशेष भाग गोलोक में सुदामा और विराजा रहते थे। सुदामा को विराजा से प्रेम हो गया था। लेकिन विराजा कृष्ण जी को चाहती थीं। एक दिन राधा ने कृष्ण और विराजा को प्रेम करते देख लिया। इससे गुस्से में आकर राधा ने विराजा को पृथ्वी पर आने का श्राप दिया। विराजा का जन्म धर्मध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ।

राधा ने क्रोध में सुदामा को भी श्राप दिया था। इसके चलते सुदामा का जन्म राक्षसराज दम्भ के यहां शंखचूण के रूप में हुआ। पृथ्वी पर शंखचूड़ का तुलसी से विवाह हुआ। शंखचूड़ ब्रम्हा जी का भक्त था। उसने तपस्या करके ब्रम्हा जी से अजेय होने का वरदान हासिल कर लिया था। इसके कुछ समय बाद ही शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। शंखचूड़ के अत्याचारों से मनुष्य से लेकर देवता भी परेशान हो उठे।

देवताओं ने इसके लिए शिव जी से मदद मांगी। लेकिन शंखचूड़ को श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की प्राप्ति की वजह से शिव जी उसका वध नहीं कर पाए। इस पर विष्णु जी ने ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूड़ से श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। साथ ही शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के शील का हरण भी कर लिया। इस मौके पर शिव जी ने शंखचूड़ को अपनी त्रिशूल से भस्म कर दिया। इस प्रकार से शिव जी ने सुदामा के पुनर्जन्म का वध किया था।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

अमोघ शिव कवच



शिव कवच अत्यंत दुर्लभ परन्तु चमत्कारिक है, इसका प्रभाव अमोघ है | बड़ी से बड़ी मुसीबतों को समाप्त करने में सिद्धहस्त यह शिव कवच परम-कल्याणकारी है |

अथ विनियोग:

अस्य श्री शिव कवच स्त्रोत्र मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, श्री सदाशिव रुद्रो देवता, ह्रीं शक्ति:, रं कीलकम, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजं, श्री सदाशिव प्रीत्यर्थे शिवकवच स्त्रोत्र जपे विनियोग: |
अथ न्यास: ( पहले सभी मंत्रो को बोलकर क्रम से करन्यास करे | तदुपरांत इन्ही मंत्रो से अंगन्यास करे| )

करन्यास
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने अन्गुष्ठाभ्याम नम: |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने तर्जनीभ्याम नम: |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने मध्यमाभ्याम नम:|
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्याम नम: |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्याम नम: |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने करतल करपृष्ठाभ्याम नम: |

अंगन्यास
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने हृदयाय नम: |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने शिरसे स्वाहा |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने शिखायै वषट |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने कवचाय हुम |
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने नेत्रत्रयाय वौषट|
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट |

अथ दिग्बन्धन:
ॐ भूर्भुव: स्व: |
ध्यानम
कर्पुरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम |
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ||

श्री शिव कवचम
ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय | त्र्यम्बक सदा-शिव !
नमस्ते-नमस्ते । ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः ।
ह्रीं ॐ ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय ।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-
स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-
तत्त्व-विदूराय,सर्व-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे,
नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-
सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-
गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-
धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-
प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-
भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-
प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय,
सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-
ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-
स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-
प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-
कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-
लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय,
सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-
लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय,
निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय,
निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय,
निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय,
निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय,
निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय,
निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-
शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ
हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं
क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
परम-शान्त-स्वरूपाय, सोहं-तेजोरूपाय, हंस-तेजोमयाय,
सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय,
श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-
सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-
योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय,
क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-
भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-
चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-
तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-
पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार
नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-
वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल
ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम
हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर ।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-
मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय
मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-
तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन
विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन
छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय
निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय,
अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-
गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-
महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय,
नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-
तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं
मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय ।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ
ह्रों