गुरुवार, 4 जुलाई 2019

नारद जी का गुरु धारण करना




निगुरा हमको न मिले पापी मिलें हज़ार।।
इक निगुरे के सीस पर लख पापियों का भार।।

देवर्षि नारद जी के विषय में ऐसा प्रसिद्ध है कि अपने तप के प्रभाव से उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त थी कि वे इस शरीर से ही वैकुण्ठ चले जाते थे। ऐसी शक्ति प्राप्त करके उनके ह्मदय में अहंकार प्रवेश कर गया था। एक बार देवर्षि नारद जी जब वैकुण्ठ गए तो भगवान विष्णु ने हमेशा की तरह उनका हार्दिक अभिनन्दन किया और उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। भगवान विष्णु से कुछ देर वार्तालाप करने के उपरान्त जब नारद जी विदा हुए तो भगवान ने अपने अऩुचरों को बुलाया और जहाँ नारद जी बैठे थे, उस स्थान की ओर संकेत करते हुए कहा-नारद जी के बैठने से यह स्थान अपिवत्र हो गया है, अतएव इस स्थान को अच्छी तरह धोकर पवित्र कर दो।

अनुचर आज्ञा पालन में लग गए। इधर नारद जी को कोई बात याद आ गई। वे अभी दूर नहीं गए थे, अतः पुनः वापिस लौट आए, परन्तु अनुचरों को वह स्थान जहाँ वे बैठे थे, साफ करते देखकर विस्मय से खड़े रह गए। कुछ क्षण वे मौन खड़े रहे, फिर भगवान के चरणों में निवेदन किया-प्रभो! एक तरफ तो मेरा इतना सम्मान और दूसरी तरफ मेरा इतना अनादर कि जिस जगह पर मैं बैठा था उसे साफ कराया जा रहा है।

भगवान ने कहा-नारद जी! यह ठीक है कि आप ज्ञानी, ध्यानी और वेदों-शास्त्रों के महान ज्ञाता हैं। यह भी ठीक है कि आप महान तपस्वी हैं और तपोबल से जब चाहें वैकुण्ठ आदि देवलोकों में आ-जा सकते हैं। आपको इसके लिए कोई रोक-टोक नहीं है। परन्तु आपने चूंकि अभी गुरू की शरण ग्रहण नहीं की, इसलिए हम आपको पवित्र नहीं मानते। यही कारण है कि जब आप यहाँ आकर बैठते हैं तो आपके जाने के बाद हम वह स्थान अपवित्र समझकर स्वच्छ एवं पवित्र करवाते हैं।

नारदजी ने कहा-भगवन्! यह सत्य है कि मैने किसी को गुरु धारण नहीं किया, परन्तु तप साधना तो की है और उस तप-साधना द्वारा मैं आपको प्राप्त करने मे भी सफल हुआ हूँ। आपको प्राप्त करके क्या मैं पवित्र नहीं हो गया?

भगवान ने कहा-नारद जी! यह ठीक है, कि तप साधना द्वारा वैकुण्ठ आने के आप अधिकारी हो गए हैं, परन्तु आपका यह कहना सरासर गलत है कि आप मुझे प्राप्त कर चुके हैं। आपकी साधना मनमति की साधना है, इसीलिए आपके अन्दर अहंता एवं अहंकार ने आसन जमा रखा है। इस अहंता-अहंकार के परदे ने अभी भी आपको मुझसे अलग कर रखा है। अहंता अहंकार के इस परदे को दूर करने के लिए ही गुरु की शरण में जाना आवश्यक होता है। नारद जी ने कहा-यदि गुरु की शरण में जाना इतना ही आवश्यक है तो फिर मैं आपको ही गुरु धारण कर लेता हूँ।

भगवान ने कहा-मैं किसी प्रकार भी आपका गुरु नहीं हो सकता, क्योंकि मैं सूक्ष्म एवं निराकार हूँ, और आप स्थूल एवं साकार हैं। मनुष्य का गुरु जब भी होगा साकार ही होगा। साकार रूप गुरु से ही मनुष्य को परमार्थ का लाभ प्राप्त हो सकता है, क्योंकि वह सेवक को अपने सान्निध्य में रखकर उसे भक्ति के भेद से परिचित करा सकता है। सूक्ष्म एवं निराकार भला मनुष्य को यह भेद कैसे समझा सकता है? इसीलिए सभी ऋषियों मुनियों ने साकार रुप गुरु की शरण ग्रहण करने और गुरु की भक्ति करने पर बल दिया है। इसके बिना न कोई मुझे प्राप्त कर सकता है और न ही किसी का परमार्थ सिद्ध हो सकता है।

नारद जी ने निवेदन किया कि मैं किसको अपना गुरु बनाऊँ। भगवान ने कहा-आप कल प्रातःकाल गंगा जी के किनारे चले जाएं और जो मनुष्य सबसे पहले मिले, उसे ही अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा ले लें। इसीमें आपकी भलाई है। भगवान की आज्ञा लेकर नारद जी विदा हुए और मत्र्यलोक में आए। उनके मस्तिष्क में सारी रात भगवान विष्णु की बातें ही गूँजती रहीं। प्रातः होते ही वे गंगा जी की ओर चल पड़े। गंगा जी के निकट पहुँच कर क्या देखते हैं कि एक धीवर (मछुआरा) कन्धे पर जाल रखे सामने से आ रहा है। उसे देखते ही नारद जी ने अपने माथे पर हाथ मारा और मुँह में बड़बड़ाते हुए कहा-यह कैसा अपशकुन हुआ!

भगवान ने तो कहा था कि सबसे पहले जो मनुष्य मिले, उसे ही गुरु धारण कर लेना, परन्तु सबसे पहले तो यह धीवर ही मिला, तो क्या इसे ही गुरु बनाना पड़ेगा? यह अपढ़, गंवार धीवर मुझ जैसे ज्ञानी, ध्यानी का गुरु कैसे हो सकता है? यह भला मुझे क्या ज्ञान देगा? यह सोचकर वे उलटे पाँव लौट चले। जैसे ही वे वापिस मुड़े कि पीछे से आवाज़ आई -यह नारद भी कैसा नासमझ और अज्ञानी है, क्योंकि इसे भगवान की बात पर भी विश्वास नहीं। भगवान के समझाने पर आया था गुरु धारण करने, परन्तु इसमें तो अहंता-अहंकार कूट-कूटकर भरा हुआ है।

कानों में ये शब्द पड़ते ही नारद जी ठिठक गए। कुछ पल इन शब्दों पर विचार करते रहे फिर लौटकर निवेदन किया-गुरुदेव। मुझे क्षमा करें और अपनी शरण में लीजिए। धीवर ने उसे गुरु-दीक्षा देकर विदा किया। नारद जी सीधे वैकुण्ठ पहुँचे। उन्हें देखकर भगवान विष्णु बोले। नारद जी! गुरु मिले? नारद जी ने उत्तर दिया-प्रभो! मिले तो सही पर--। भगवान ने उनकी बातबीच में ही काटते हुए कहा-""पर'' शब्द कहने का अर्थ है कि आपने मेरे कहने से गुरु धारण किया, परन्तु आपकी अपने गुरु में श्रद्धा एवं निष्ठा नहीं है। श्रद्धा रहित मनुष्य के लिए परमार्थ की दृष्टि से आपका सब किया-कराया व्यर्थ हो गया। अब तो आपको चौरासी अवश्य भुगतनी पड़ेगी। नारद जी से थोड़ी सी भूल हो गई जो गुरुदेव जी के सन्दर्भ में उन्होने "पर' शब्द लगा दिया-इस पर भगवान बोले कि ऐ नारद! तुमने गुरु के प्रसंग में "पर' शब्द का प्रयोग गिया है। इसलिये तुम्हें चौरासी भुगतनी होगी। नारद् जी ने प्रार्थना की भगवन! इस दुःख से छूटने का उपाय क्या होगा? श्री भगवान ने कथन किया कि ""चौरासी देना तो मेरा काम है और उससे छुटकारा दिलाना केवल सद्गुरु का काम है।''

कहु नानक प्रभ इहै जनाई। बिन गुरू मुकति न पाइये भाई।।

इसलिये तुम श्रद्धा और नम्रतापूर्वक सद्गुरुदेव जी की शरण में जाओ और वे जैसे कहें उनके वचन का अक्षरशः पालन करो। तब चौरासी की यातना से निस्तार हो सकता है अन्य कोई उपाय नहीं है। नारद जी बुद्धिमान थे। मन की तुला पर लगे तोलने-एक तरफ रखा चौरासी भोगने का दुःख और दूसरी तरफ रखा सद्गुरुदेव जी की आज्ञा में रहने के नियम को। और समझ लिया कि यह तो अपार लाभ का व्यापार है। मैं श्री गुरुदेव जी की आज्ञा के परिपालन से काल की जन्म जन्मान्तरों तक की पाबन्दी के दुःखों से छूट जाऊँगा। यह विचार कर अत्यन्त श्रद्धा भाव से श्री गुरुदेव जी के समीप गये। उनके चरण कमलों में पहुँच कर उन्हें साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया और श्री गुरुदेव जी का हुक्मनामा पाकर उठे और विनय की कि मैं भूलनहार हूँ, आप क्षमाशील हैं, मेरी भूलचूक के लिये क्षमा करें। मुझसे जो अपराध हुआ है उसके बदले भगवान ने मुझे चौरासी भोगने का दण्ड दिया है। आप ही उससे छुड़ाने में समर्थ हो। आप ही युक्ति से मुक्ति दे सकते हो।

विशेषः- जब नारद जी श्री गुरुदेव जी के निकट जा रहे थे तो उनके गुरुमहाराज जो धीवर थे उन्हें मार्ग में मिल गये और नारद जी ने उसी जगह ही जहां धूलि बिछी थी दण्डवत् प्रणाम कर दिया। दैववश वहां एक फैशनेबल सज्जन खड़े थे उन्होने नारद जी से कहा कि भूमि पर धूलि में लेट जाना कौन सी सयानप है? नारद जी ने उससे कहा कि तुम ही बताओ कि सतगुरुदेव भगवन जी के पवित्र चरण कमलों में दण्डवत् करने से काल के आगे बार बार जन्मों तक नाक रगड़ने से जीवन बच जाता है। थोड़ी सी नम्रता दिखलाने से महान कष्ट कट जाये तो कौन सी बुरी बात है? तब वह पुरूष क्षमा मांगने लगा और कहने लगा कि भक्तों और सन्तों से अधिक बुद्धिमान तीनों लोकों के अन्दर और कोई नहीं क्योंकि वे ही लाभ-हानि को पूरी तरह पहचानते हैं।

श्री गुरुदेव जी ने नारद जी की श्रद्धा व नम्रता को देखकर बड़ी प्रसन्नता पूर्वक कहा कि नारद! गुरुदेव ने हँसते हुए कहा-तुम फिर विष्णुलोक जाओ और भगवान से कहो कि जो चौरासी मैने भोगनी है, उसका नक्शा बना कर दिखला दो जब वे नक्शा तैयार कर दें तो तुम उस पर लोट-पोट हो जाना। जब भगवान ऐसा करने का कारण पूछें तो उत्तर देना चौरासी भोग रहा हूँ, क्योंकि वह चौरासी भी आपकी बनाई हुई है और यह भी आपने ही बनाई है। भगवान की कृपा से तुम्हारी चौरासी एक पल में ही कट जायेगी। यह हमारा आशीर्वाद है। श्री गुरुदेव का आशीर्वाद पाकर नारद जी श्री भगवान जी के पास पहुँचे और आज्ञानुसार श्री भगवान से चौरासी का नक्शा बना कर दिखाने की विनय की जब वह मानचित्र पूर्ण हुआ तो नारद जी उसमें लेटनी लगाने लगे। श्री भगवान जी ने पूछा-नारद! तुम यह क्या कर रहे हो? धूलि में क्यों लेट रहे हो? नारद जी ने उत्तर दिया कि मैं गुरूदेव जी की आज्ञा मानकर थोड़ी देर मिट्टी में लेटने से यदि चौरासी कट जाये तो यह बड़े लाभ का सौदा है। श्री गुरुदेव जी ने आशीर्वाद देकर कहा है कि ऐसा करने से श्री भगवान तुम्हारी चौरासी क्षमा कर देंगे-अतएव मैं चौरासी भुगत रहा हूँ। श्री भगवान ने कथन किया कि श्री सद्गुरुदेव जी के वरदान को तो हम भी नहीं मिटा सकते। ये अधिकार तो उनको हैं जो शरण में आए हुए किसी के भी जन्म जन्मान्तर के दुःख एक पल में काट देते हैं।

गुरु की टेक रहहु दिन रात। जाकी कोई न मेटे दात।

इसलिये हे नारद जी तुम बड़े भाग्यवान हो जो गुरु भक्ति की सरल राह को अपना कर अऩेक जीवों के लिये मार्ग बना रहे हो इस पथ पर जो चलेगा उसको इस लोक में भी सुख मिलेगा। और उसका परलोक भी सँवर जायेगा।
इह लोक सुखी परलोक सुहेले। नानक हर प्रभ आपहि मेले।

तब भगवान बोले-नारद जी! आपने देखा कि गुरु ने कितनी सुगमता से आपकी चौरासी भोगने से बचा लिया। अब की बार नारद जी गुरुदेव के चरणों में उपस्थित हुए तो उनके दिल की अवस्था बदल चुकी थी। अब उनके दिल में गुरुदेव के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। उन्होने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक गुरुदेव के चरणों में दण्डवत्-प्रणाम किया। गुरुदेव ने उसके ह्मदय की अवस्था को जानकर कहा-अब तुम वास्तव में ही गुरुमुख बन गए हो और तुम्हारे दिल में गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न हो गई है। अब बैठ जाओ और आँखें बन्द करके अपने अन्दर गुरु का ध्यान करो।

नारद जी ने आँखें बन्द करके गुरु का ध्यान किया तो अहंता-अहंकार के सब आवरण छिन्न-भिन्न हो गए और घट में निर्मल प्रकाश फैल गया। उस प्रकाश में नारद जी को गुरुदेव के ज्योतिर्मय स्वरुप के दर्शन हुए। गुरुदेव के इस अलौकिक स्वरूप के दर्शन कर वे आत्म विभोर हो गये। तभी अपने अन्दर उन्हें गुरुदेव कीआवाज़ सुनाई दी-नारद! तुम गुरु को अपढ़ समझ रहे थे, परन्तु स्मरण रखो कि गुरु परमपुरुष अथवा परमतत्त्व है। यही गुरु का वास्तविक स्वरुप है, इसलिये गुरु के अस्तित्व में तनिक भी सन्देह करना अथवा अश्रद्धा रखना कदापि उचित नहीं। अब तुमने गुरु के वास्तविक स्वरुप को जान लिया, इसलिये अब तुम निगुरे नहीं रहे, अपितु गुरुमुख बन गए हो। अब तुम जहाँ बैठोगे, वह स्थान पवित्र समझा जाएगा। नारद जी ने आँखें खोलीं। गुरुदेव को सम्मुख देखकर उन्होंने दण्डवत-वन्दना की, तत्पश्चात हाथ जोड़कर निवेदन किया गुरुदेव! मुझपर अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाये रखें। तब गुरुदेव ने नारद जी को भक्ति के गहन रहस्य विस्तार से समझाये। भक्ति का वास्तविक भेद प्राप्त करके उनका जीवन धन्य हो गया। तत्पश्चात उन्होंने ""भक्ति सूत्र'' की रचना की जिसमें भक्ति-तत्त्व पर बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया है। अभिप्राय यह कि भक्ति-मार्ग पर चलने वाले जिज्ञासु पुरुष के लिए सद्गुरु की शरण ग्रहण करना परमावश्यक है।

श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ सद्गुरु के वचनों पर आचरण करके ही मनुष्य इस मार्ग पर सफलता प्राप्त कर सकता और अपना जीवन धन्य बना सकता है।

गुरुवार, 20 जून 2019

अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र



चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

आधे शरीर में चम्पापुष्पों-सी गोरी पार्वतीजी हैं और आधे शरीर में कर्पूर के समान गोरे भगवान शंकरजी सुशोभित हो रहे हैं। भगवान शंकर जटा धारण किये हैं और पार्वतीजी के सुन्दर केशपाश सुशोभित हो रहे हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


कस्तूरिकाकुंकुमचर्चितायै चितारज:पुंजविचर्चिताय।
कृतस्मरायै विकृतस्मराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

पार्वतीजी के शरीर में कस्तूरी और कुंकुम का लेप लगा है और भगवान शंकर के शरीर में चिता-भस्म का पुंज लगा है। पार्वतीजी कामदेव को जिलाने वाली हैं और भगवान शंकर उसे नष्ट करने वाले हैं, ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


चलत्क्वणत्कंकणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणीनूपुराय।
हेमांगदायै भुजगांगदाय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

भगवती पार्वती के हाथों में कंकण और पैरों में नूपुरों की ध्वनि हो रही है तथा भगवान शंकर के हाथों और पैरों में सर्पों के फुफकार की ध्वनि हो रही है। पार्वतीजी की भुजाओं में बाजूबन्द सुशोभित हो रहे हैं और भगवान शंकर की भुजाओं में सर्प सुशोभित हो रहे हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपंकेरुहलोचनाय।
समेक्षणायै विषमेक्षणाय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

पार्वतीजी के नेत्र प्रफुल्लित नीले कमल के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर के नेत्र विकसित कमल के समान हैं। पार्वतीजी के दो सुन्दर नेत्र हैं और भगवान शंकर के (सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि) तीन नेत्र हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालांकितकन्धराय।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

पार्वतीजी के केशपाशों में मन्दार-पुष्पों की माला सुशोभित है और भगवान शंकर के गले में मुण्डों की माला सुशोभित हो रही है। पार्वतीजी के वस्त्र अति दिव्य हैं और भगवान शंकर दिगम्बर रूप में सुशोभित हो रहे हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तडित्प्रभाताम्रजटाधराय।
निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

पार्वतीजी के केश जल से भरे काले मेघ के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर की जटा विद्युत्प्रभा के समान कुछ लालिमा लिए हुए चमकती दीखती है। पार्वतीजी परम स्वतन्त्र हैं अर्थात् उनसे बढ़कर कोई नहीं है और भगवान शंकर सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


प्रपंचसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय।
जगज्जनन्यैजगदेकपित्रे नम: शिवायै च नम: शिवाय।

भगवती पार्वती लास्य नृत्य करती हैं और उससे जगत की रचना होती है और भगवान शंकर का नृत्य सृष्टिप्रपंच का संहारक है। पार्वतीजी संसार की माता और भगवान शंकर संसार के एकमात्र पिता हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय नम: शिवायै च नम: शिवाय।

पार्वतीजी प्रदीप्त रत्नों के उज्जवल कुण्डल धारण किए हुई हैं और भगवान शंकर फूत्कार करते हुए महान सर्पों का आभूषण धारण किए हैं। भगवती पार्वतीजी भगवान शंकर की और भगवान शंकर भगवती पार्वती की शक्ति से समन्वित हैं। ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है।


एतत् पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी।
प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात् सदा तस्य समस्तसिद्धि:।

आठ श्लोकों का यह स्तोत्र अभीष्ट सिद्धि करने वाला है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह समस्त संसार में सम्मानित होता है और दीर्घजीवी बनता है, वह अनन्त काल के लिए सौभाग्य व समस्त सिद्धियों को प्राप्त करता है।

।।इति आदिशंकराचार्य विरचित अर्धनारीनटेश्वरस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

गुरुवार, 30 मई 2019

भद्रवाह कैलाश पर्वत


भद्रवाह कैलाश पर्वत, जहाँ वासुकि नाग जी देते है दर्शन जोकि वासुकि नाग का भी पवित्र स्थान माना जाता है, वहां पर स्थित कैलाश - कुण्ड आध्यात्मिक और पर्यटन की दृष्टि से कई लोक मान्यताओं को अपने में संजोए हुए है भद्रवाह का प्राचीन नाम भद्रकाशी कहा जाता है और इस घाटी में शिवजी के साथ - साथ वासुकि नाग का आवास एवं विशेष कृपा मानी जाती है। इसी के साथ - साथ इस घाटी को पार्वती जी का मायका भी माना जाता है। प्रमाणों के साथ यह भी बताया जाता है कि पांडवों ने अपना अज्ञात वास भी इन वादियों - घाटियों में व्यतीत किया था। इसलिए शिव-पार्वती और वासुकि नाग की भूमि और पांडवों की तपोभूमि होने के कारण समस्त भद्रवाही अपने को बहुत अधिक भाग्यशाली मानते हैं।

यह पवित्र कुंड वास्तव में भगवन नाग की एक अशीम हिमाछादित झील है।यहाँ प्रतिवर्ष सितम्बर मास में एक विशाल मेला लगता है। मेले में जम्मू , कश्मीर , हिमाचल , हरयाणा , पंजाब और दिल्ली तक के अशंकया लोग भाग लेते हैं। स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होती है।

सामान्य श्रद्धालु लोग झील के बर्फीले गहरे पानी में सेब फेकते हैं। पवित्र झील में सफ़ेद रंग क विशालकाय वासुकि नाग के दर्शन भी अशंकया लोगो को प्रायः होते रहते हैं। नागराज को बर्फीले पानी में देख कर यात्री दांग रह जाते हैं।

कैलाश यात्रा वाश्तव में भारतवर्ष की कठिनतम यात्रियों में से है। कश्मीर सरकार की ओर से जगह जगह उपचार , आवास , सुरक्षा आदि समुचित यात्रियों प्रबंध आदि समुचित प्रबंध होते हैं।

वासुकि कुंड आधयात्मिक , ऎतिहासिक और रहश्यमय स्थल हैं। कहते हैं , लाखों वर्ष पूर्व गरूर और वासुकि का भयानक यूद्ध हुआ था। वासुकि गरूर से बचने के लिए भदरवाह के कैलाश परबत में चुप गए। गरूर ने वासुकि की छिपने वाली जगह में एक गड्ढा बना दिया। वह आशिम गड्ढा तत्काल दुद्घ गंगा के पवित्र जल से भर गया।

नागराज वासुकि ने उस पावित्र्य जल में छुपकर आत्मा रक्षा की थी। तभी से यह सर्वोच झील विदेशी पर्यटकों और पर्वतारोहियों आकर्षण का केंद्र हैं। आज भी पर्वतारोही कैलाश पर्वत के परवता रोहन के बिना आपने अभियानों को अपूर्ण मानते हैं।


गुरुवार, 16 मई 2019

रुद्राभिषेक पाठ एवं इसके भेद


ब्रम्हा आदि देवता भी जिस अक्षर का सार न पा सके उस आदि अनादी से रहित निर्गुण स्वरुप ॐ के स्वरुप में विराजमान जो अदितीय शक्ति भूतभावन कालो के भी काल गंगाधर भगवान महादेव को प्रणाम करते है ।

अपितु शास्त्रों और पुरानो में पूजन के कई प्रकार बताये गए है लेकिन जब हम शिव लिंग स्वरुप महादेव का अभिषेक करते है तो उस जैसा पुण्य अश्वमेघ जैसेयाग्यों से भी प्राप्त नही होता !

स्वयं श्रृष्टि कर्ता ब्रह्मा ने भी कहा है की जब हम अभिषेक करते है तो स्वयं महादेव साक्षात् उस अभिषेक को ग्रहण करने लगते है । संसार में ऐसी कोई वस्तु , कोई भी वैभव , कोई भी सुख , ऐसी कोई भी वास्तु या पदार्थ नही है जो हमें अभिषेक से प्राप्त न हो सके! वैसे तो अभिषेक कई प्रकार से बताये गये है । लेकिन मुख्या पांच ही प्रकार है !

(1) रूपक या षड पाठ - रूद्र के छः अंग कहे गये है इन छह अंग का यथा विधि पाठ षडंग पाठ कहा गया है।

शिव कल्प सूक्त - प्रथम हृदय रूपी अंग है

पुरुष सूक्त - द्वितीय सर रूपी अंग है ।

उत्तरनारायण सूक्त - शिखा है।

अप्रतिरथ सूक्त - कवचरूप चतुर्थ अंग है ।

मैत्सुक्त - नेत्र रूप पंचम अंग कहा गया है ।

शतरुद्रिय -  अस्तरूप षष्ठ अंग कहा गया है।

इस प्रकार - सम्पूर्ण रुद्राष्टाध्यायी के दस अध्यायों का षडडंग रूपक पाठ कहलाता है षडंग पाठ में विशेष बात है की इसमें आठवें अध्याय के साथ पांचवे अध्याय की आवृति नही होती है कर्मकाण्डी भाषा मे इसे ही नमक-चमक से अभिषेक करना कहा जाता है।

(2) रुद्री या एकादशिनि - रुद्राध्याय की ग्यारह आवृति को रुद्री या एकादिशिनी कहते है रुद्रो की संख्या ग्यारह होने के कारण ग्यारह अनुवाद में विभक्त किया गया है।

(3) लघुरुद्र- एकादशिनी रुद्री की ग्यारह अव्रितियों के पाठ को लघुरुद्र पाठ कहा गया है।

यह लघु रूद्र अनुष्ठान एक दिन में ग्यारह ब्राह्मणों का वरण करके एक साथ संपन्न किया जा सकता है। तथा एक ब्राह्मण द्वारा अथवा स्वयं ग्यारह दिनों तक एक एकादशिनी पाठ नित्य करने पर भी लघु रूद्र संपन्न होहै है।

(4) महारुद्र -- लघु रूद्र की ग्यारह आवृति अर्थात एकादशिनी रुद्री की 121 आवृति पाठ होने पर महारुद्र अनुष्ठान होता है । यह पाठ ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा 11 दिन तक कराया जाता है।

(5) अतिरुद्र - महारुद्र की 11 आवृति अर्थात एकादिशिनी रुद्री की 1331 आवृति पाठ होने से अतिरुद्र अनुष्ठान संपन्न होता है ये तीनो प्रकार से किये जा सकते है शास्त्रों में इन अनुष्ठानो का अत्यधिक फल है व तीनो का फल समान है।

(1)अनुष्ठात्मक
(2) अभिषेकात्मक
(3) हवनात्मक

रुद्राष्टाध्यायी के प्रत्येक अध्याय मेँ - प्रथमाध्याय का प्रथम मन्त्र "गणानां त्वा गणपति गुम हवामहे " बहुत ही प्रसिद्ध है । यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति के लिए भी प्रयुक्त होता है।

द्वितीय एवं तृतीय मन्त्र मे गायत्री आदि वैदिक छन्दोँ तथा छन्दो में प्रयुक्त चरणो का उल्लेख है । पाँचवे मन्त्र "यज्जाग्रतो से सुषारथि" पर्यन्त का मन्त्रसमूह शिवसंकल्पसूक्त कहलाता है। इन मन्त्रोँ का देवता "मन"है इन मन्त्रो में मन की विशेषताएँ वर्णित हैँ। परम्परानुसार यह अध्याय गणेश जी का है।

द्वितीयाध्याय मे सहस्रशीर्षा पुरुषः से यज्ञेन यज्ञमय तक 16 मन्त्र पुरुषसूक्त से है, इनके नारायण ऋषि एवं विराट पुरुष देवता है। 17 वे मन्त्र अद्भ्यः सम्भृतः से श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च ये छः मन्त्र उत्तरनारायणसूक्त रुप मे प्रसिद्ध है।
द्वितीयाध्याय भगवान विष्णु का माना गया है।

तृतीयाध्याय के देवता देवराज इन्द्र है तथा अप्रतिरथ सूक्त के रुप मे प्रसिद्ध है। कुछ विद्वान आशुः शिशानः से अमीषाज्चित्तम् पर्यन्त द्वादश मन्त्रो को स्वीकारते हैं तो कुछ विद्वान अवसृष्टा से मर्माणि ते पर्यन्त 5 मन्त्रो का भी समावेश करते है। इन मन्त्रो के ऋषि अप्रतिरथ है। इन मन्त्रो द्वारा इन्द्र की उपासना द्वारा शत्रुओ स्पर्शाधको का नाश होता है।

प्रथम मन्त्र "ऊँ आशुः शिशानो .... का अर्थ देखेँ त्वरा से गति करके शत्रुओ का नाश करने वाला, भयंकर वृषभ की तरह, सामना करने वाले प्राणियोँ को क्षुब्ध करके नाश करने वाला। मेघ की तरह गर्जना करने वाला। शत्रुओं का आवाहन करने वाला, अति सावधान, अद्वितीय वीर, एकाकी पराक्रमी, देवराज इन्द्र शतशः सेनाओ पर विजय प्राप्त करता है।

चतुर्थाध्याय मे सप्तदश मन्त्र है जो मैत्रसूक्त के रुप मे प्रसिद्ध है। इन मन्त्रो मे भगवान सूर्य की स्तुति है " ऊँ आकृष्णेन रजसा " मे भुवनभास्कर का मनोरम वर्णन है। यह अध्याय सूर्यनारायण का है ।

पंचमाध्याय मे 66 मन्त्र है यह अध्याय प्रधान है, इसे शतरुद्रिय कहते है।
"शतसंख्यात रुद्रदेवता अस्येति शतरुद्रियम्। इन मन्त्रो मे रुद्र के शतशः रुप वर्णित है। कैवल्योपनिषद मे कहा गया है कि शतरुद्रिय का अध्ययन से मनुष्य अनेक पातको से मुक्त होकर पवित्र होता है। इसके देवता महारुद्र शिव है।
षष्ठाध्याय को महच्छिर के रुप मेँ माना जाता है। प्रथम मन्त्र मे सोम देवता का वर्णन है। प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र "ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे" इसी अध्याय मे है। इसके देवता चन्द्रदेव है।

सप्तमाध्याय को जटा कहा जाता है । उग्रश्चभीमश्च मन्त्र मे मरुत् देवता का वर्णन है। इसके देवता वायुदेव है।

अष्टमाध्याय को चमकाध्याय कहा जाता है । इसमे 29 मन्त्र है। प्रत्येक मन्त्र मे "च "कार एवं "मे" का बाहुल्य होने से कदाचित चमकाध्याय अभिधान रखा गया है । इसके ऋषि "देव"स्वयं है तथा देवता अग्नि है। प्रत्येक मन्त्र के अन्त मे यज्ञेन कल्पन्ताम् पद आता है।

रुद्री के उपसंहार मे "ऋचं वाचं प्रपद्ये " इत्यादि 24 मन्त्र शान्तयाध्याय के रुप मे एवं "स्वस्ति न इन्द्रो " इत्यादि 12 मन्त्र स्वस्ति प्रार्थना के रुप मे प्रसिद्ध है।

रुद्राभिषेक प्रयुक्त होने वाले प्रशस्त द्रव्य व उनका फल

1. जलसे रुद्राभिषेक -- वृष्टि होती है

2. कुशोदक जल से -- समस्त प्रकार की व्याधि की शांति

3. दही से अभिषेक -- पशु प्राप्ति होती है

4. इक्षु रस -- लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए

5. मधु (शहद)-- धन प्राप्ति के लिए यक्ष्मारोग (तपेदिक)।

6. घृत से अभिषेक व तीर्थ जल से भी -- मोक्ष प्राप्ति के लिए।

7. दूध से अभिषेक -- प्रमेह रोग के विनाश के लिए -पुत्र प्राप्त होता है ।

8. जल की की धारा भगवान शिव को अति प्रिय है अत: ज्वर के कोपो को शांत करने के लिए जल धरा से अभिषेक करना चाहिए।

9. सरसों के तेल से अभिषेक करने से शत्रु का विनाश होता है।यह अभिषेक विवाद मकदमे सम्पति विवाद न्यालय में विवाद को दूर करते है।

10.शक्कर मिले जल से पुत्र की प्राप्ति होती है ।

11. इतर मिले जल से अभिषेक करने से शारीर की बीमारी नष्ट होती है ।

12. दूध से मिले काले तिल से अभिषेक करने से भगवन शिव का आधार इष्णन करने से सा रोग व शत्रु पर विजय प्राप्त होती है ।

13.समस्त प्रकार के प्रकृतिक रसो से अभिषेक हो सकता है ।
सार --उप्प्युक्त द्रव्यों से महालिंग का अभिषेक पर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर भक्तो की तदन्तर कामनाओं का पूर्ति करते है ।

अत: भक्तो को यजुर्वेद विधान से रुद्रो का अभिषेक करना चाहिए ।

विशेष बात: रुद्राध्याय के केवल पाठ अथवा जप से ही सभी कम्नावो की पूर्ति होती है ।

रूद्र का पाठ या अभिषेक करने या कराने वाला महापातक रूपी पंजर से मुक्त होकर सम्यक ज्ञान प्राप्त होता है और अंत विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करता है ।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

प्रभुश्रीराम के राज्याभिषेक के समय वेदों द्वारा की गई प्रभुश्रीराम की स्तुति भावार्थ सहित



प्रभुश्रीराम के राज्याभिषेक के समय वेदों द्वारा की गई प्रभुश्रीराम की स्तुति भावार्थ सहित! बहुत बहुत फलदायक स्तुति है, इसे अपने पूजापाठ में सम्मिलित करें!


* जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥
भावार्थ:-सगुण और निर्गुण रूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त! हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान्‌ आपको नमस्कार करता हूँ॥


तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥
जे नाथ करि करुना बिलोकि त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥

भावार्थ:-हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि) से देख लिया, वे (माया जनित) तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गए। हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्री रामजी! हमारी रक्षा कीजिए। हम आपको नमस्कार करते हैं॥
 

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥

भावार्थ:-जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव-दुर्लभ (देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥




* जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी॥
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥
भावार्थ:-जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर (शिला बनी हुई) गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गई, जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जाने से घट्ठे पड़ गए हैं, हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं॥


*अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥
भावार्थ:-वेद शास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है, जो (प्रवाह रूप से) अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं, जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है, जिसमें नित्य नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्व रूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥


*जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥
भावार्थ:-ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है- (जो इस प्रकार कहकर उस) ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किंतु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणा के धाम प्रभो! हे सद्गुणों की खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें॥



* सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥

भावार्थ:-वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अंतर्धान हो गए और ब्रह्मलोक को चले गए॥

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

कृष्ण-सुदामा की मित्रता



कृष्ण-सुदामा की मित्रता बहुत प्रचलित है। सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। अपने बच्चों का पेट भर सके उतने भी सुदामा के पास पैसे नहीं थे। सुदामा की पत्नी ने कहा, "हम भले ही भूखे रहें, लेकिन बच्चों का पेट तो भरना चाहिए न ?" इतना बोलते-बोलते उसकी आँखों में आँसू आ गए। सुदामा को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कहा, "क्या कर सकते हैं ? किसी के पास माँगने थोड़े ही जा सकते है।" पत्नी ने सुदामा से कहा, "आप कई बार कृष्ण की बात करते हो। आपकी उनके साथ बहुत मित्रता है ऐसा कहते हो। वे तो द्वारका के राजा हैं। वहाँ क्यों नहीं जाते ? जाइए न ! वहाँ कुछ भी माँगना नहीं पड़ेगा !"

सुदामा को पत्नी की बात सही लगी। सुदामा ने द्वारका जाने का तय किया। पत्नी से कहा, "ठीक है, मैं कृष्ण के पास जाऊँगा। लेकिन उसके बच्चों के लिए क्या लेकर जाऊँ ?"सुदामा की पत्नी पड़ोस में से पोहे ले आई। उसे फटे हुए कपडे में बांधकर उसकी पोटली बनाई। सुदामा उस पोटली को लेकर द्वारका जाने के लिए निकल पड़े।

द्वारका देखकर सुदामा तो दंग रह गए। पूरी नगरी सोने की थी। लोग बहुत सुखी थे। सुदामा पूछते-पूछते कृष्ण के महल तक पहुँचे। दरवान ने साधू जैसे लगनेवाले सुदामा से पूछा, "एय, यहाँ क्या काम है ?"

सुदामा ने जवाब दिया, "मुझे कृष्ण से मिलना है। वह मेरा मित्र है। अंदर जाकर कहिए कि सुदामा आपसे मिलने आया है।" दरवान को सुदामा के वस्त्र देखकर हँसी आई। उसने जाकर कृष्ण को बताया। सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण खड़े हो गए ! और सुदामा से मिलने दौड़े । सभी आश्चर्य से देख रहे थे ! कहाँ राजा और कहाँ ये साधू ?

कृष्ण सुदामा को महल में ले गए। सांदीपनी ऋषि के गुरुकुल के दिनों की यादें ताज़ा की। सुदामा कृष्ण की समृद्धि देखकर शर्मा गए। सुदामा पोहे की पोटली छुपाने लगे, लेकिन कृष्ण ने खिंच ली। कृष्ण ने उसमें से पोहे निकाले। और खाते हुए बोले, "ऐसा अमृत जैसा स्वाद मुझे और किसी में नहीं मिला।"

बाद में दोनों खाना खाने बैठे। सोने की थाली में अच्छा भोजन परोसा गया। सुदामा का दिल भर आया। उन्हें याद आया कि घर पर बच्चों को पूरा पेट भर खाना भी नहीं मिलता है। सुदामा वहाँ दो दिन रहे। वे कृष्ण के पास कुछ माँग नहीं सके। तीसरे दिन वापस घर जाने के लिए निकले। कृष्ण सुदामा के गले लगे और थोड़ी दूर तक छोड़ने गए।

घर जाते हुए सुदामा को विचार आया, "घर पर पत्नी पूछेगी कि क्या लाए ? तो क्या जवाब दूँगा ?"

सुदामा घर पहुँचे। वहाँ उन्हें अपनी झोपड़ी नज़र ही नहीं आई ! उतने में ही एक सुंदर घर में से उनकी पत्नी बाहर आई। उसने सुंदर कपड़े पहने थे। पत्नी ने सुदामा से कहा, "देखा कृष्ण का प्रताप ! हमारी गरीबी चली गई कृष्ण ने हमारे सारे दुःख दूर कर दिए।" सुदामा को कृष्ण का प्रेम याद आया। उनकी आँखों में खूशी के आँसू आ गए।

देखा दोस्तों, कृष्ण और सुदामा का प्रेम यानी सच्चा मित्र प्रेम। तो दोस्तों सच्चे प्रेम में ऊँच या नीच नहीं देखी जाती और न ही अमीरी-गरीबी देखी जाती है। इसीलिए आज इतने युगों के बाद भी दुनिया कृष्ण और सुदामा की दोस्ती को सच्चे मित्र प्रेम के प्रतीक के रूप में याद करती है।