मंगलवार, 12 मई 2020

जब भगवान शिव ने मगरमच्छ बनकर ली पार्वती की परीक्षा !


माता पार्वती शिव जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप कर रही थीं। उनके तप को देखकर देवताओं ने शिव जी से देवी की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की।शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा लेने सप्तर्षियों को भेजा। सप्तर्षियों ने शिव जी के सैकड़ों अवगुण गिनाए पर पार्वती जी को महादेव के अलावा किसी और से विवाह मंजूर न था।

विवाह से पहले सभी वर अपनी भावी पत्नी को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। इसलिए शिव जी ने स्वयं भी पार्वती की परीक्षा लेने की ठानी।भगवान शंकर प्रकट हुए और पार्वती को वरदान देकर अंतर्ध्यान हुए। इतने में जहां वह तप कर रही थीं, वही पास में तालाब में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया।

लड़का जान बचाने के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती जी से उस बच्चे की चीख सुनी न गई। द्रवित हृदय होकर वह तालाब पर पहुंचीं। देखती हैं कि मगरमच्छलड़के को तालाब के अंदर खींचकर ले जा रहा है। लड़के ने देवी को देखकर कहा- मेरी न तो मां है न बाप, न कोई मित्र... माता आप मेरी रक्षा करें.. .

पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! इस लडके को छोड़ दो। मगरमच्छ बोला- दिन के छठे पहर में जो मुझे मिलता है, उसे अपना आहार समझ कर स्वीकार करना, मेरा नियम है।ब्रह्मदेव ने दिन के छठे पहर इस लड़के को भेजा है। मैं इसे क्यों छोडूं ?

पार्वती जी ने विनती की- तुम इसे छोड़ दो। बदले में तुम्हें जो चाहिए वह मुझसे कहो।

मगरमच्छ बोला- एक ही शर्त पर मैं इसे छोड़ सकता हूं। आपने तप करके महादेव से जो वरदान लिया, यदि उस तप का फल मुझे दे दोगी तो मैं इसे छोड़ दूंगा। पार्वती जी तैयार हो गईं। उन्होंने कहा- मैं अपने तप का फल तुम्हें देने को तैयार हूं लेकिन तुम इस बालक को छोड़ दो।

मगरमच्छ ने समझाया- सोच लो देवी, जोश में आकर संकल्प मत करो। हजारों वर्षों तक जैसा तप किया है वह देवताओं के लिए भी संभव नहीं। उसका सारा फल इस बालक के प्राणों के बदले चला जाएगा।

पार्वती जी ने कहा- मेरा निश्चय पक्का है। मैं तुम्हें अपने तप का फल देती हूं। तुम इसका जीवन दे दो।

मगरमच्छ ने पार्वती जी से तपदान करने का संकल्प करवाया। तप का दान होते ही मगरमच्छ का देह तेज से चमकने लगा। मगर बोला- हे पार्वती, देखो तप के प्रभाव से मैं तेजस्वी बन गया हूं। तुमने जीवन भर की पूंजी एक बच्चे के लिए व्यर्थ कर दी। चाहो तो अपनी भूल सुधारने का एक मौका और दे सकता हूं।

पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ? देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया।

पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो?

पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी।

महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं....

शनिवार, 9 मई 2020

शनि चालीसा




!! जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल,
दीनन के दुःख दूर करि , कीजै नाथ निहाल,
जय जय श्री शनिदेव प्रभु , सुनहु विनय महाराज ,
करहु कृपा हे रवि तनय , राखहु जन की लाज !!

!! जयति जयति शनिदेव दयाला करत सदा भक्तन प्रतिपाला,
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै माथे रतन मुकुट छवि छाजै,
परम विशाल मनोहर भाला टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला,
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके हिये माल मुक्तन मणि दमकै !!

!! कर में गदा त्रिशूल कुठारा पल बिच करैं अरिहिं संहारा,
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन,
सौरी, मन्द शनी दश नामा भानु पुत्र पूजहिं सब कामा,
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं रंकहुं राव करैं क्षण माहीं !!

!! पर्वतहू तृण होइ निहारत तृणहू को पर्वत करि डारत,
राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो,
वनहुं में मृग कपट दिखाई मातु जानकी गई चुराई,
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा मचिगा दल में हाहाकारा !!

!! रावण की गति-मति बौराई रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई,
दियो कीट करि कंचन लंका बजि बजरंग बीर की डंका,
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा चित्र मयूर निगलि गै हारा,
हार नौलखा लाग्यो चोरी हाथ पैर डरवायो तोरी !!

!! भारी दशा निकृष्ट दिखायो तेलहिं घर कोल्हू चलवायो,
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों,
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी आपहुं भरे डोम घर पानी,
तैसे नल पर दशा सिरानी भूंजी-मीन कूद गई पानी !!

!! श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई पारवती को सती कराई,
तनिक विकलोकत ही करि रीसा नभ उड़ि गतो गौरिसुत सीसा,
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी बची द्रोपदी होति उधारी,
कौरव के भी गति मति मारयो युद्ध महाभारत करि डारयो !!

!! रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला लेकर कूदि परयो पाताला,
शेष देव-लखि विनती लाई रवि को मुख ते दियो छुड़ाई,
वाहन प्रभु के सात सुजाना जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना,
जम्बुक सिह आदि नख धारी सो फल ज्योतिष कहत पुकारी !!

!! गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै,
गर्दभ हानि करै बहु काजा सिह सिद्ध्कर राज समाजा,
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै मृग दे कष्ट प्राण संहारै,
जब आवहिं स्वान सवारी चोरी आदि होय डर भारी !!

!! तैसहि चारि चरण यह नामा स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा,
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं,
समता ताम्र रजत शुभकारी स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी,
जो यह शनि चरित्र नित गावै कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै !!

!! अद्भुत नाथ दिखावैं लीला करैं शत्रु के नशि बलि ढीला,
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई विधिवत शनि ग्रह शांति कराई,
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत दीप दान दै बहु सुख पावत,
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा !!

॥ दोहा ॥

!! पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार,
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार !!

गुरुवार, 7 मई 2020

शिवलिंग - हल्दी और मेहँदी


शिवलिंग एक ऐसी शक्ति है, जिसकी पूजा से हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। शिवलिंग यानी शिवजी का साक्षात रूप। विधि-विधान से शिवलिंग का पूजन करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा भक्त को प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार सभी देवी-देवताओं के विधिवत पूजन आदि धार्मिक कर्मों मे बहुत सी सामग्रियां सम्मिलित की जाती हैं। इन सामग्रियों मे 'हल्दी' भी है। पूजन कर्म मे हल्दी का महत्वपूर्ण स्थान है।

कई पूजन विधियां ऐसी हैं जो हल्दी के बिना पूर्ण नहीं मानी जा सकती। हल्दी एक औषधि भी है और हम इसका प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन मे भी करते हैं। पूजन मे हल्दी ,गंध और औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है। हल्दी शिवजी के अतिरिक्त लगभग सभी देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है। हल्दी का स्त्री सौंदर्य प्रसाधन में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।


शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है और इसी वजह से महादेव को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है।
शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए लेकिन जलाधरी पर चढ़ाई जानी चाहिए। शिवलिंग दो भागों से मिलकर बनी होती है। 

एक भाग शिवलिंग शिवजी का प्रतीक है और दूसरा भाग जलाधारी माता पार्वती का प्रतीक है। शिवलिंग चूंकि पुरुष तत्व का प्रतिनिधित्व करता है अत: इस पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है। हल्दी स्त्रियों के सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री है और जलाधारी मां पार्वती की प्रतीक है अत: इस पर हल्दी चढ़ाई जानी चाहिए।



  • जलाधरी पर कभी दिया नहीं जलाते 
  • शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ नारियल कभी फोड़ा नहीं जाता उसे विसर्जित कर दिया जाता है।
  • शिवलिंग भगवान् शंकर का प्रतीक होने के कारण उसे तुलसी के नीचे नहीं रखा जाता , तुलसी के नीचे शालिग्राम ( भगवान् विष्णु का निर्गुण रूप ) रखा जाता है.
  • शिवलिंग पर तुलसी की मंजरी (तुलसी के फूल) चढ़ाए जाते हैं।
  • भोलेनाथ को पूजा मे मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती।
इससे जुड़ी एक कथा के अनुसार मेंहदी का पौधा कामधेनु के रक्त से उत्पन्न माना जाता है। इसीलिए पूजा मे शिवजी को मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती है। उस कथा के अनुसार जमदग्नि ऋषि के पास कामधेनु गाय थी , जिसे सहस्त्रार्जुन ने आश्रम से ले जाना चाहा और उसने इसी प्रयास मे कामधेनु को कुछ तीर मारे और जब उन तीरों से घायल कामधेनु का रक्त जमीन पर गिरा तो मेंहदी का पौधा उत्पन्न हुआ।

इसीलिए हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार शिवजी को मेंहदी नहीं चढ़ाई जाती।
!! ॐ नमः शिवाय !!

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

शिव के डमरू की नाद (आवाज) में होती हैं ये अद्भूत क्षमतायें!


सनातन धर्म संस्कृति मानता है कि ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है! आत्मा इस जगत का कारण है! सनातन धर्म में कुछ ध्वनियों को पवित्र और रहस्यमयी माना गया है, जैसे- मन्दिर की घंटी, शंख, बांसुरी, वीणा, मंजीरा, करतल, पुंगी या बीन, ढोल, नगाड़ा, मृदंग, चिमटा, तुनतुना, घाटम, दोतार, तबला और डमरू!

डमरू या डुगडुगी एक छोटा संगीत वाद्य यंत्र होता है! डमरू को हिन्दू, तिब्बती और बौद्ध धर्म में बहुत महत्व दिया गया है! भगवान शंकर के हाथों में डमरू को दर्शाया गया है! साधु और मदारियों के पास अक्सर डमरू मिल जाएगा!

शंकु आकार के बने इस ढोल के बीच के तंग हिस्से में एक रस्सी बंधी होती है जिसके पहले और दूसरे सिरे में पत्थर या कांसे का एक-एक टुकड़ा लगाया जाता है! जब डमरू को मध्य से पकड़ कर हिलाया जाता है तो यह डला (टुकड़ा) पहले एक मुख की खाल पर प्रहार करता है और फिर उलट कर दूसरे मुख पर, जिससे 'डुग-डुग' की आवाज उत्पन्न होती है, इसीलिए इसे डुगडुगी भी कहते हैं!

डमरू की 14 आवाजें 

वेबदुनिया की रिसर्च अनुसार जब डमरू बजता है तो उसमें से 14 प्रकार की ध्वनि निकलती हैं! पुराणों में इसे मंत्र माना गया! यह ध्वनि इस प्रकार है:- 'अइउण्‌, त्रृलृक, एओड्, ऐऔच, हयवरट्, लण्‌, ञमड.णनम्‌, भ्रझभञ, घढधश्‌, जबगडदश्‌, खफछठथ, चटतव, कपय्‌, शषसर, हल्‌ ! उक्त आवाजों में सृजन और विध्वंस दोनों के ही स्वर छिपे हुए हैं! यही स्वर व्याकरण की रचना के सूत्र धार भी है! सद्ग्रन्थों की रचना भी इन्ही सूत्रों के आधार पर हुई !

डमरू बजने का लाभ

पुराणानुसार भगवान शिव नटराज के डमरू से कुछ अचूक और चमत्कारी मंत्र निकले थे! कहते हैं कि यह मंत्र कई बीमारियों का इलाज कर सकते हैं! कोई भी कठिन कार्य हो शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है! उक्त मंत्र या सूत्रों के सिद्ध होने के बाद जपने से सर्प, बिच्छू के काटे का जहर उतर जाता है! ऊपरी बाधा हट जाती है! माना जाता है कि इससे ज्वर, सन्निपात आदि को भी उतारा जा सकता है!

रहस्य

डमरू की ध्वनि जैसी ही ध्वनि हमारे अन्दर भी बजती रहती है, जिसे अ, उ और म या ओम् कहते हैं! हृदय की धड़कन व ब्रह्माण्ड की आवाज में भी डमरू के स्वर मिश्रित हैं!

डमरू की आवाज लय में सुनते रहने से मस्तिष्क को शांति मिलती है और हर तरह का तनाव हट जाता है!इसकी आवाज से आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा व शक्तियों का पलायन हो जाता है! डमरू भगवान शिव का वाद्ययंत्र ही नहीं यह बहुत कुछ है! इसे बजाकर भूकम्प लाया जा सकता है व बादलों में भरा पानी भी बरसाया जा सकता है!

डमरू की आवाज यदि लगातर एक जैसी बजती रहे तो इससे चारों ओर का वातावरण बदल जाता है! यह बहुत भयानक भी हो सकता है और और सुखदायी भी! डमरू के भयानक आवाज से लोगों के हृदय भी फट सकते हैं! कहते हैं कि भगवान शंकर इसे बजाकर प्रलय भी ला सकते हैं! यह बहुत ही प्रलयंकारी आवाज सिद्ध हो सकती है! डमरू की आवाज में अनेक गुप्त रहस्य छिपे हुए हैं! महादेव की पूजार्चना में डमरु की ध्वनि का विशेष महत्त्व हैं!

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?


शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आइए जानते है शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर भस्म क्यों अर्पित की जाती है ?

भस्म का रहस्य?

शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।

ऐसे तैयार की जाती है भस्म.

शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।

भस्म से बढ़ता है आकर्षण.

ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।


भस्म से होती है शुद्धि.

जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

भस्म की विशेषता.

भस्म की यह विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसे शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम भी करती है। शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर बताया गया है, जहां का वातावरण एकदम प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाने में भस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भस्म धारण करने वाले शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए। जहां जैसे हालात बनते हैं, हमें भी स्वयं को उसी के अनुरूप बना लेना चाहिए।

जब शनि देव के सामने हार मानी भगवान शिव ने !


पौराणिक कथा के अनुसार एक समय शनि देव भगवान शंकर के धाम हिमालय पहुंचे। उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शंकर को प्रणाम कर उनसे आग्रह किया," हे प्रभु! मैं कल आपकी राशि में आने वाला हूं अर्थात मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ने वाली है।

शनिदेव की बात सुनकर भगवान शंकर हतप्रभ रह गए और बोले, "हे शनिदेव! आप कितने समय तक अपनी वक्र दृष्टि मुझ पर रखेंगे।"

शनिदेव बोले, "हे नाथ! कल सवा प्रहर के लिए आप पर मेरी वक्र दृष्टि रहेगी। शनिदेव की बात सुनकर भगवन शंकर चिंतित हो गए और शनि की वक्र दृष्टि से बचने के लिए उपाय सोचने लगे।"

शनि की दृष्टि से बचने हेतु अगले दिन भगवन शंकर मृत्युलोक आए। भगवान शंकर ने शनिदेव और उनकी वक्र दृष्टि से बचने के लिए एक हाथी का रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर को हाथी के रूप में सवा प्रहर तक का समय व्यतीत करना पड़ा तथा शाम होने पर भगवान शंकर ने सोचा, अब दिन बीत चुका है और शनिदेव की दृष्टि का भी उन पर कोई असर नहीं होगा। इसके उपरांत भगवान शंकर पुनः कैलाश पर्वत लौट आए। भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में जैसे ही कैलाश पर्वत पर पहुंचे उन्होंने शनिदेव को उनका इंतजार करते पाया। भगवान शंकर को देख कर शनिदेव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भगवान शंकर मुस्कराकर शनिदेव से बोले,"आपकी दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ।"

यह सुनकर शनि देव मुस्कराए और बोले," मेरी दृष्टि से न तो देव बच सकते हैं और न ही दानव यहां तक कि आप भी मेरी दृष्टि से बच नहीं पाए।"

यह सुनकर भगवान शंकर आश्चर्यचकित रह गए। शनिदेव ने कहा, मेरी ही दृष्टि के कारण आपको सवा प्रहर के लिए देव योनी को छोड़कर पशु योनी में जाना पड़ा इस प्रकार मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ गई और आप इसके पात्र बन गए।

शनि देव की न्यायप्रियता देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और शनिदेव को हृदय से लगा लिया।