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सोमवार, 31 मई 2021

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।


पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।

महादेव के राम

 महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?


महादेव जी ने पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवी ! जो व्यक्ति एक बार *राम* कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ।

पार्वती जी ने एक बार महादेव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगाते हैं?उसी समय महादेव जी ने पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग *राम नाम सत्य है* कहते हुए शव को ला रहे थे।

 महादेव   ने कहा कि देखो पार्वती ! इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो *राम* नाम का स्मरण करते हुए आते हैं और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य *राम* नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगों के मुख से *राम* नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।

राम* नाम निमित्त बनने वाले यह  शव मुझे बहुत प्रिय है।
एक बार महादेव कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थीं। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए।महादेव ने कहा कि इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो।

पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ।
महादेवने बताया, केवल एक बार *राम* कह लो तुम्हें सहस्र नाम, भगवान के एक हज़ार नाम लेने का फल मिल जाएगा।
एक *राम* नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है।पार्वती जी ने वैसा ही किया।

पार्वत्युवाच –
*केनोपायेन लघुना विष्णोर्नाम सहस्रकं?*
*पठ्यते पण्डितैर्नित्यम् श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो।।


ईश्वर उवाच-
श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे।*
*सहस्र नाम तत्तुल्यम राम नाम वरानने।।*

यह *राम* नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ।


*आपदामपहर्तारम् दातारम् सर्वसंपदाम्।*
*लोकाभिरामम् श्रीरामम् भूयो भूयो नमयहम्।*

भव सागर के सभी समस्याओं और दुःख के बीजों को भूंज के रख देनेवाला/समूल नष्ट कर देने वाला, सुख संपत्तियों को अर्जित करने वाला, यम दूतों को खदेड़ने/भगाने वाला केवल *राम* नाम का गर्जन(जप) है।

*भर्जनम् भव बीजानाम्, अर्जनम् सुख सम्पदाम्।*
*तर्जनम् यम दूतानाम्, राम रामेति गर्जनम्।*

प्रयास पूर्वक स्वयम् भी *राम* नाम जपते रहना चाहिए और दूसरों को भी प्रेरित करके *राम* नाम जपवाना चाहिए। इस से अपना और दूसरों का तुरन्त कल्याण हो जाता है। यही सबसे सुलभ और अचूक उपाय है।
इसीलिए हमारे देश में प्रणाम

​​​​​​ *राम राम* कहकर किया जाता है।

​​​​​​*जय श्री राम*

सोमवार, 24 जुलाई 2017

महादेव द्वारा बताया गया ध्यान का ज्ञान।


                 


महादेव ने बताया है कि रात के समय एक शांत व अंधकारमय स्थान पर बैठें।दोनों नेत्र बंद करे फिर दोनों हाथ की तरजनी अंगुली से दोनों कानों को बंद कर लें।कुछ ही समय के अभ्यास के बाद   एक अग्नि शब्द सुनाई देगा जिसे  ब्रह्म कहतें हैं।इस शब्द को सुनने का अभ्यास करना शब्द ब्रह्म का ध्यान करना कहलाता है।
यह ना ॐ कार है, न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है।यह अनाहत नाद है अर्थात बिना आघात या बिना बजाये उतपन्न होने वाला शब्द/ध्वनि।

 इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है यह नौ प्रकार का होता है:-

1. मेघनाद : इसके चिंतन से कभी विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ता।
2. शंख नाद : इसके ध्यान व अभ्यास से इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है।
3. वंशी नाद : इसके ध्यान से सम्पूर्ण तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं।
4. घोष नाद यह आत्मशुद्धि करता है, सब रोगों का नाश करता है ।
5. वीणा नाद : इससे दूर दर्शन की शक्ति प्राप्त होती है।
6. श्रृंग नाद : यह अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला है।
7. दुन्दुभी नाद : इसके ध्यान से साधक जरा व मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है।
8. कांस्य नाद : यह प्राणियों की गति को स्तंभित कर देता है। यह विष, भूत, ग्रह आदि सबको बांधता है। इन सबको  छोड़कर जो अन्य शब्द सुनाई देता है वह तुंकार कहलाता है। तुंकार का ध्यान करने से साक्षात् शिवत्व की प्राप्ति होती है -शिव पुराण, उमा संहिता
9. घंट नाद : इसका उच्चारण साक्षात् शिव करते हैं। यह सभी देवताओं को आकर्षित कर लेता है, महासिद्धियाँ देता है और कामनाएं पूर्ण करता है।


बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

महादेव बोलते है किसी को मिटाने का नहीं अभी तोह उसको पल्वित करना ही सही मार्ग है



अमेरिका दुनिया का सबसे धनी देश है ! वहां साल के शुरू  में बच्चो को किताबे मुफ्त में दी जाती है और साल के अंत में उनसे वापस ले ली जाती है !ताकि दूसरे बच्चे उसे पढ़  सके ! गरीब देश है   भारत यहाँ हर  साल  पुरानी  किताबे रद्दी में बेचीं  जाती है और नई  किताबे  खरीदी  जाती है या यह कहे बच्चो को नयी किताबे खरीदने को विवश किया जाता है ! 

जिसे करोडो रूपए बर्बाद और कितने पेड़  काटे  जाते है और उसके बाद  फिर परियावरण  को बचाने  की मुहिम शरू होती है और फिर करोडो रूपए की लूट होती है ! यह सब हमारे शिक्षा के मंदिर और उसे संचालित करने वालो की दलाली से हो रहा है ! सता  तोह बदलती है पर व्यवस्था  नही ! आइये हम अपने आपको इस कुम्भकर्ण की नींद से जगाएं ! ताकि हम अपना  और आने वालो को एक ऐसा जीवन दे ताकि इस समाज में कभी को आशिक्षित  और  बुखा  न रहे! मिल जुल कर इंसानियत को बढ़ावा दे इसे संसार में समानता  होगी और  भारत भी उन्नति करेगा!

महादेव बोलते है किसी को मिटाने का नहीं अभी तोह उसको पल्वित करना ही सही मार्ग है ! इसे लिए कैलाश में सिंह भी और बेल भी मूषक भी और सर्प भी किसी को किसका भय नही  ! सभी सुख  और शांति से अपना अपना धर्म निभाते आ रहे है ! कहीं कोइए वरचापस और प्रभुता का भय नही ! क्योंकि वरचापस तोह धर्म विरोधी है ! 

प्रभुता की आवशकता तोह वहां होती है जहा मत विभिन का आदर नही होता और समर्ण रहे एक दूसरे की सहायता करना मतों का आदान प्रदान करना इनकी आवशकता समय के साथ बढ़ती रहेगी ! जितना भींता को सामान दोगे उतना संसार में सामंजस्य बढेगा ! यही समानता शांति और अहिंसा विकास का आधार बनेगा और यही विकास जब जब तुम्हारी प्रसन्ता बनकर प्रत्यक्ष होगा तब तब महादेव को प्रसन्ता होगी