गुरुवार, 20 सितंबर 2018

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग- कुंभकर्ण के पुत्र को मार कर यहां स्थापित हुए थे भगवान शिव



भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में भीमाशंकर का स्थान छठा है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे से लगभग 110 किमी दूर सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे कुंभकर्ण के पुत्र भीम की एक कथा प्रसिद्ध है।


ऐसे हुई थी यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना

कहा जाता है कि कुंभकर्ण के एक पुत्र का नाम भीम था। कुंभकर्ण को कर्कटी नाम की एक महिला पर्वत पर मिली थी। उसे देखकर कुंभकर्ण उस पर मोहित हो गया और उससे विवाह कर लिया। विवाह के बाद कुंभकर्ण लंका लौट आया, लेकिन कर्कटी पर्वत पर ही रही। कुछ समय बाद कर्कटी को भीम नाम का पुत्र हुआ। जब श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध कर दिया तो कर्कटी ने अपने पुत्र को देवताओं के छल से दूर रखने का फैसला किया।


बड़े होने पर जब भीम को अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला तो उसने देवताओं से बदला लेने का निश्चय कर लिया। भीम ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके उनसे बहुत ताकतवर होने का वरदान प्राप्त कर लिया। कामरूपेश्वप नाम के राजा भगवान शिव के भक्त थे। एक दिन भीम ने राजा को शिवलिंग की पूजा करते हुए देख लिया। भीम ने राजा को भगवान की पूजा छोड़ उसकी पूजा करने को कहा। राजा के बात न मानने पर भीम ने उन्हें बंदी बना लिया। राजा ने कारागार में ही शिवलिंग बना कर उनकी पूजा करने लगा। जब भीम ने यह देखा तो उसने अपनी तलवार से राजा के बनाए शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया। ऐसा करने पर शिवलिंग में से स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए। भगवान शिव और भीम के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें भीम की मृत्यु हो गई। फिर देवताओं ने भगवान शिव से हमेशा के लिए उसी स्थान पर रहने की प्रार्थना की। देवताओं के कहने पर शिव लिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इस स्थान पर भीम से युद्ध करने की वजह से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमशंकर पड़ गया।

ऐसा है मंदिर का स्वरूप

भीमशंकर मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन यहां के कुछ भाग का निर्माण नया भी है। इस मंदिर के शिखर का निर्माण कई प्रकार के पत्थरों से किया गया है। यह मंदिर मुख्यतः नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर में कहीं-कहीं इंडो-आर्यन शैली भी देखी जा सकती है।


मंदिर की दीवारों की कलाकारी




भीमशंकर मंदिर से पहले ही शिखर पर देवी पार्वती का एक मंदिर है। इसे कमलजा मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी ने राक्षस त्रिपुरासुर से युद्ध में भगवान शिव की सहायता की थी। युद्ध के बाद भगवान ब्रह्मा ने देवी पार्वती की कमलों से पूजा की थी।



मंदिर के पास स्थित है कई कुंड।



यहां के मुख्य मंदिर के पास मोक्ष कुंड, सर्वतीर्थ कुंड, ज्ञान कुंड, और कुषारण्य कुंड भी स्थित है। इनमें से मोक्ष नामक कुंड को महर्षि कौशिक से जुड़ा हुआ माना जाता है और कुशारण्य कुंड से भीम नदी का उद्गम माना जाता है।

कब जाएं


भीमशंकर ज्योतिर्लिंग जाने के लिए साल का कोई भी समय चुना जा सकता है। महाशिवरात्रि के समय यहां पर विशेष मेला लगता है।

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के आस-पास घूमने के स्थान

1. हनुमान तालाब- भीमशंकर मंदिर से कुछ दूरी पर हनुमान तालाब नामक स्थान है।
2. गुप्त भीमशंकर- भीमशंकर मंदिर से कुछ दूरी पर गुप्त भीमशंकर स्थित है।
3. कमलजा देवी- भीमशंकर मंदिर से पहले देवी पार्वती का कमलजा नामक एक मंदिर है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

गणेश को मातृ पितृ भक्ति ने बनाया दिया प्रथम पूज्य




हम सभी जानते है की हमारे सभी मंगल कार्यो में हम सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करते है | उन्हें निमंत्रण देते है और अपने सभी कार्यो को निर्विघ्नं सम्पन्न करने की विनती करते है | इन्हे सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता का वरदान प्राप्त है | इसके पीछे दो कथाये जुडी हुई है |

भगवान श्री गणेश मंगल करने वाले हैं। वे विघ्न व बाधाओं का हरण करते हैं इसलिए विघ्नहर्ता कहे जाते हैं। शिव-पार्वती के पुत्र गणेश ज्ञान व बुद्धि के देवता हैं तो मातृ व पितृ भक्ति के पर्याय भी हैं। पूरे भारत में उन्हें प्रथम पूज्य देव का मान प्राप्त है। हर शुभ कार्य में श्री गणेश का वंदन सबसे पहले किया जाता है।

भाद्रपक्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को दोपहर 12 बजे जन्में श्री गणेश को सभी देवताओं का सम्मान व शक्तियां प्राप्त हैं।

पहली कथा में बताया गया है की इन्हे यह वरदान इनके माता पिता भगवान शिव और पार्वती से प्राप्त हुआ | उन्होंने अपने मातृ पितृ भक्ति और सेवा में उन्हें ही अपना सर्वश्य मान कर परिक्रमा की की | ऐसी भक्ति और सेवा देखकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया गया |

ब्रह्मा जी जब ‘देवताओं में कौन प्रथम पूज्य हो’ इसका निर्णय करने लगे, तब यह तय किया गया कि जो पृथ्वी-प्रदक्षिणा सबसे पहले करके आएगा वही सबसे पहले पूज्य माना जाएगा। गणेश जी का छोटा सा मूषक कैसे सबसे आगे दौड़े। पर वे थे बुद्धि के महान देवता | उन्होंने युक्ति निकाली और अपने पिता और माता भगवान शंकर और पार्वती जी की प्रदक्षिणा करने लगे । उनके लिए उनके माता-पिता ही सब कुछ थे | उन्होंने सात प्रदक्षिणा कर ली। शिवजी का ह्रदय यह देखकर गदगद हो गया और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। जाहिर है भगवान गणेश शेष देवताओं से सबसे पहले पहुंचे। उनका यह बुद्धि-कौतुक देखकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया।


दूसरी कथा में बताया गया है की जब शिव ने गणेश का सिर काटा था तब माँ पार्वती अत्यंत रूद्र हो गयी थी | तीनो लोको में त्राहिमाम त्राहिमाम हो गया था | सभी देवी देवता कैलाश पर एकत्रित हो गये | उमा ने शिव जी ने अपने पुत्र को पूण्य जीवित करने की मांग कर ली | शिव आदेश पर गणेश के कटे सिर की जगह हाथी के बच्चे का सिर लगाया गया और गणेश फिर से जीवित हो गये | तब सभी देवी देवताओ ने उन्हें लाड किया और तरह तरह के वरदान दिए | उनमे से एक वरदान प्रथम पूज्य होने का भी गणपति को प्राप्त हुआ |

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

अंजनी महादेव



धरती पर दूसरा स्थान जहां बनता है बर्फ का शिवलिंग, अमरनाथ से भी बड़ा होता बाबा का स्वरूप

बाबा भोलनाथ के भक्त इस शिवलिंग को अमरनाथ जितना ही शक्तिशाली मानते हैं और यहां अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दर्शन को आते है.

मनाली की पहाड़ियों में भी प्रकट होते हैं बाबा बर्फानी, बनता है 30-40 फुट का शिवलिंग

पहाड़ों में बाबा भोलेनाथ के दर्शन केवल जम्मू कश्मीर के अमरनाथ और उत्तराखंड के केदारनाथ धाम में ही नहीं होते हैं. अब हिमाचल प्रदेश की पहाड़ों में भी बाबा भोलेनाथ प्रकट हुए है. जी हां यहां अमरनाथ की भांति भोलेनाथ बाबा बर्फानी के रूप में प्रकट हुए है. हिमाचल में मनाली कुछ ही दूरी पर पहाड़ियों के बीच बर्फ का इतना विशालकाय शिवलिंग बनता है जिसके दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.


इतिहास

पौरणिक मान्यताओं के अनुसार जिस जगह यह शिवलिंग बनता है वह भूमि भगवान हनुमान की माता अंजनी की तपोस्थली मानी जाती है और इसीलिए इस विशालकाय शिवलिंग को अंजनी महादेव कहा जाता है.बताया जाता है कि माता अंजनी इस स्थान पर बनते शिवलिंग की पूजा व तपस्या करती थी तथा इस गुप्त स्थान के बारे में किसी को भी पता नहीं था लेकिन बाबा के लोगों को बताने के बाद से ही अबतक दूर-दूर से श्रद्धालु बड़ी संख्या में बाबा के इस विशाल रूप को देखने आते है.



यहां बाबा भोलेनाथ का शिवलिंग स्वरूप करीब 30-40 फुट का होता है. ऐसी मान्यता है कि धरती पर भगवान का बर्फ से बनने वाला यह दूसरी शिवलिंग है. मनाली से सोलंग वैली पहुंचने के बाद करीब दो किलोमीटर की अंजनी महादेव की यात्रा शुरू हो जाती है.



यह पूरी यात्रा पहाड़ों पर पैदल चलकर या घोड़ों के जरिए ही तय की जाती है. शिवलिंग के साथ ही पहाड़ के नीचे बाबा की कुटिया है जिसमें पिछले कुछ सालों से बाबा प्रकाश पुरी बारह माह सर्दी व गर्मी में यहां रहते थे कुछ वर्ष पहले उनकी मृत्यु के बाद बाबा के शिष्य अब इस कुटिया में रहकर बाबा भोलनाथ की पूजा करते है. गौरतलब है कि अमरनाथ के शिवलिंग की उंचाई लगभग 22 फीट होती है लोग कई दिनों की कठिन यात्रा कर बाबा के दर्शन करते हैं लेकिन इस अंजनी महादेव में बनने वाले शिवलिंग के दर्शन के लिए आप मनाली के सोलंग वैली में पहुंच कर कुछ की घंटों में कर सकते है. बताया जाता है कि माता अंजनी इस स्थान पर बनते शिवलिंग की पूजा व तपस्या करती थी तथा इस गुप्त स्थान के बारे में किसी को भी पता नहीं था लेकिन बाबा के लोगों को बताने के बाद से ही अब तक दूर-दूर से श्रद्धालु बड़ी संख्या में बाबा के इस विशाल रूप को देखने आते है.

बाबा भोलनाथ के भक्त इस शिवलिंग को अमरनाथ जितना ही शक्तिशाली मानते हैं और यहां अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दर्शन को आते है. यहां बाबा के बर्फ रूपी स्वरूप के दर्शन के चलते हर वर्ष दिसंबर, जनवरी, फरवरी व मार्च तक श्रद्धालु 2 कि.मी. की यात्रा कर यहां पहुंचते हैं. खुले आसमान में दिसंबर माह में ही इस स्थान में यह शिवलिंग रूप लेना शुरू कर देता है तथा जनवरी माह तक पूर्ण रूप लेकर यह शिवलिंग की उंचाई लगभग 35 से 40 फीट हो जाती है. 

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

श्री शिव लिंगाष्टकम



लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर करते हैं, श्री शिव लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है:-

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम्
निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है और जन्म और मृत्यु के दुखो का विनाश करते है ऐसे भगवान आशुतोष को नित्य निरंतर प्रणाम है |

देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम्
कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ |

सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम्
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है |

कनक महामणि भूषित लिंगम्
फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम |

कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम्
पंकज हार सुशोभित लिंगम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ |

देवगणार्चित सेवित लिंगम्
भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है |

अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम्
सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥
भावार्थः जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ |

सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम्
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥
भावार्थः जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ |

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
भावार्थः जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है |

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

अघोर पंथ


अघोर पंथ के साधुओं के बारे में गलत बातें अधिक चर्चित हैं।मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जो शमशान जैसी भयावह और विचित्र जगह पर भी उसी सहजता से रह सके जैसे लोग घरों में रहते हैं। अघोर पंथ की उत्पत्ति अघोर पंथ के प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं।ज्यादातर लोगों को अघोर पंथी काफी भयावह, रक्त, मांस, मदिरा और मैथुन जैसे कृत्यों में संलग्न नज़र आते हैं। अघोर पंथ के अनुयायियों के विषय में सामान्य मान्यता यह है कि वे दीन-दुनिया से दूर सांसारिकता से विरक्त एक खास संन्यासी समुदाय हैं, जिनका कार्य केवल अपनी ईष्ट सिद्धि के लिए भयंकरतम कृत्यों में रत रहना होता है।

कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं अघोर पंथ को प्रतिपादित किया था। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को भी अघोरशास्त्र का गुरु माना जाता है। अवधूत दत्तात्रेय को भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। अघोर संप्रदाय के विश्वासों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश और स्थूल रूप में दत्तात्रेय जी ने अवतार लिया।

“अघोर” शब्द का संधि विच्छेद करना चाहिए। आप पाएंगे कि अघोर शब्द की उत्पत्ति “अ” एवं “घोर” शब्दों के सम्मिलन से हुई है।


अघोर संप्रदाय के एक संत के रूप में बाबा किनाराम की पूजा होती है। अघोर संप्रदाय के व्यक्ति शिव जी के अनुयायी होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन समस्त रूपों में विद्यमान हैं। इस शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन और सभी स्थितियों का अनुभव कर के और इन्हें जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। क्या करते हैं अघोरी अघोर संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लिए नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता के भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य हैं।

इसका कारण है कि वे दुनिया में रहते हुए सांसारिकता को त्याग चुके होते हैं और ये क्रिया अन्य पंथियों के लिए मुश्किल साबित होती है। अन्य पंथों में इस निर्दोषता और जागरण की अवस्था प्राप्त करने के लिए सांसारिकता सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।
प्रमुख अघोर स्थान वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। भगवान शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहां विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहां बाबा कीनाराम का स्थल एक महत्वपूर्ण तीर्थ भी है।

साधना की इस विशेष विधि में श्मशान में मृत शरीर के ऊपर पैर रख कर चिता भस्म लपेटे अघोरी उपासना के लिए कपाल और अंगुलि माला का प्रयोग करते हैं। इसके साथ ही वे मृत शरीर को खाते हैं तथा रक्तपान करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि इससे समदर्शिता प्राप्त होती है। इसके अलावा घृणा-द्वेष आदि विकारों का परिमार्जन भी होता है। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं।

अघोरियों का स्वभाव अघोरियों के बारे में मान्यता है कि बड़े ही रूखे स्वभाव के होते हैं लेकिन भीतर उनमें जन कल्याण की भावना छुपी होती है। अगर किसी पर मेहरबान हो जाए तो अपनी सिद्धि का शुभ फल देने में भी नहीं हिचकते और अपनी तांत्रिक क्रियाओं का रहस्य भी उजागर कर देते हैं। यहां तक कि कोई उन्हें अच्छा लग जाए तो उसे वह अपनी तंत्र क्रिया सीखाने को भी राजी हो जाते हैं लेकिन इनका क्रोध प्रचंड होता है। इनकी वाणी से सावधान रहना चाहिए। इनके आशीर्वाद शीघ्र प्रतिफलित होते हैं। यह अगर खुश हो जाए तो आपकी किस्मत बदलने की क्षमता रखते हैं। आमतौर पर यह किसी से खुलकर बात नहीं करते। अपने आप में मगन रहने वाले यह तांत्रिक, समाज से दूर रहते हैं, हिमालय की कठिन तराइयों में इनका वास होता है। कहते हैं इन्हें साक्षात शिव भी दर्शन देते हैं। और जब तक इन्हें ना छेड़ा जाए किसी का अहित नहीं करते।


अघोरी साधना कहां होती है ?

अघोरी श्‍मशान घाट में तीन तरह से साधना करते हैं - श्‍मशान साधना, शिव साधना, शव साधना। ऐसी साधनाएं अक्सर तारापीठ के श्‍मशान, कामाख्या पीठ के श्‍मशान, त्र्यम्‍बकेश्वर और उज्जैन के चक्रतीर्थ के श्‍मशान में होती है।






गुरुवार, 16 अगस्त 2018

बिजली महादेव -कुल्लू- इतिहास



भारत में भगवन शिव के अनेक अद्भुत मंदिर है उन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्तिथ बिजली महादेव। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली महादेव से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत के ऊपर बिजली महादेव का प्राचीन मंदिर है।


पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में भयंकर आकाशीय बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग एक ठोस रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली क्यों गिरती है और इस जगह का नाम कुल्लू कैसे पड़ा इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो इस प्रकार है।

रहता था कुलान्त राक्षस
कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीवजंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलान्त के इस विचार से से चिंतित हो गए।

अजगर के कान में धीरे से बोले भगवान शिव
बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है।


भगवान शिव ने इंद्र से कहा था इस स्थान पर गिराएं बिजली
कुलान्त दैत्य के मारने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे बारह साल में एक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर बारहवें साल में यहां आकाशीय बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े इकट्ठा करके शिवजी का पुजारी मक्खन से जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है।


बिजली शिवलिंग पर ही क्यों गिरती है
आकाशीय बिजली बिजली शिवलिंग पर गिरने के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव नहीं चाहते चाहते थे कि जब बिजली गिरे तो जन धन को इससे नुकसान पहुंचे। भोलेनाथ लोगों को बचाने के लिए इस बिजली को अपने ऊपर गिरवाते हैं। इसी वजह से भगवान शिव को यहां बिजली महादेव कहा जाता है। भादों के महीने में यहां मेला-सा लगा रहता है। कुल्लू शहर से बिजली महादेव की पहाड़ी लगभग सात किलोमीटर है। शिवरात्रि पर भी यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

सर्दियों में भारी बर्फबारी
यह जगह समुद्र स्तर 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। शीत काल में यहां भारी बर्फबारी होती है। कुल्लू में भी महादेव प्रिय देवता हैं। कहीं वे सयाली महादेव हैं तो कहीं ब्राणी महादेव। कहीं वे जुवाणी महादेव हैं तो कहीं बिजली महादेव। बिजली महादेव का अपना ही महात्म्य व इतिहास है। ऐसा लगता है कि बिजली महादेव के इर्द-गिर्द समूचा कुल्लू का इतिहास घूमता है। हर मौसम में दूर-दूर से लोग बिजली महादेव के दर्शन करने आते हं।