मंगलवार, 16 मार्च 2021

गंगा जल का महत्व

 

गंगा जल का सदा सेवन करना चाहिये |वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं |जिनके बीच से गंगा बहती हैं, वे सभी देश श्रेष्ठ तथा पावन हैं |उत्तम गति की खोच करनेवाले प्राणियों के लिये गंगा ही सर्वोत्तम गति हैं |

गंगा का सेवन करने पर वह माता और पिता – दोनों के कुलों का उद्धार करती हैं |एक हजार चान्द्रायण-व्रत की अपेक्षा गंगाजी के जल का पीना उत्तम हैं |एक मास गंगाजी का सेवन करनेवाला मनुष्य सब यज्ञों का फल पाता हैं |गंगा देवी सब पापों को दूर करनेवाली तथा स्वर्ग लोक देनेवाली हैं |गंगा के जल में जब तक हड्डी पड़ी रहती है, तब तक वह जीव स्वर्ग में निवास करता हैं |अंधे आदि भी गंगाजी का सेवन करके देवताओं के समान हो जाते हैं |

गंगा-तीर्थ से निकली हुई मिटटी धारण करनेवाला मनुष्य सूर्य के समान पापों का नाशक होता हैं |

जो मानव गंगा का दर्शन, स्पर्श, जलपान अथवा ‘गंगा’ इस नाम का कीर्तन करता हैं, वह अपनी सैकड़ो-हजारों पीढ़ियों के पुरुषों को पवित्र कर देता हैं | कलियुग में गंगाजी की विशेष महिमा है |

कलियुग में तीर्थ स्वभावतः अपनी अपनी शक्तियों को गंगाजी में छोड़ते है परन्तु गंगा जी अपनी शक्तियों को कही नहीं छोड़ती |गंगाजी पातको के कारण नर्क में गिरनेवाले नराधम पापियों को भी तार देती है |कई अज्ञात स्थान में मर गये हो और उनके लिए शास्त्रीय विधि से तर्पण नहीं किया गया हो तो ऐसे लोगो की हिड॒डयॉ यदि गंगाजी में प्रवाहित करते है तो उनको परलोक मेंउत्तम फल की प्राप्ति होती है |


बासी जल त्याग देने योग्य माना गया है परन्तु गंगाजल बासी होने पर भी त्याज्य नहीं है |इस लोक में गंगा जी की सेवा में तत्पर रहनेवाले मनुष्य को आधे दिन की सेवा से जो फल प्राप्त होता है वह सेकड़ो यज्ञो द्वारा भी नहीं मिलता है ।


( नारद पुराण )

देव तथा ऋषियों के स्पर्श से पावन हुआ एवं हिमालय से उद्गमित नदियों का जल, विशेषकर गंगाजल स्वाथ्यकारी अर्थात आरोग्य के लिए हितकारी है |


“हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः ।

– चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय २७, श्लोक २०९

हिमालय से प्रवाहित गंगाजल औषधि (रोगी के लिए हितकारी) है |

“यथोक्तलक्षणहिमालयभवत्वादेव गाङ्गं पथ्यम् ।


– चक्रपाणिदत्त (वर्ष १०६०)

(श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा ) राजन् ! वह ब्रह्माजी के कमण्‍डलुका जल, त्रिविक्रम (वामन) भगवान् के चरणों को धोने से पवित्रतम होकर गंगा रूप में परिणत हो गया।वे ही (भगवती) गंगा भगवान् की धवल कीर्ति के समान आकाश से (भगीरथी द्वारा) पृथ्‍वी पर आकर अब तक तीनों लोकों को पवित्र कर रही है।

“धातु: कमण्‍डलुजलं तदरूक्रमस्‍य, पादावनेजनपवित्रतया नरेन्‍द्र । स्‍वर्धन्‍यभून्‍नभसि सा पतती निमार्ष्टि, लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्ति: ।।


( श्रीमद्भा0 8।4।21)

“देवी गंगे ! आप संसाररूपी विष का नाश करनेवाली है | आप जीवनरुपा है | आप आधिभौतिक,आधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों का संहार करनेवाली तथाप्राणों की स्वामिनी हैं | आपको बार बार नमस्कार है |

“संसारविषनाशिन्ये जीवनायै नमोऽस्तु ते | तापत्रितयसंहन्त्रयै प्राणेश्यै ते नमो नम : ||

विश्व के वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल में रोगाणुओं को नष्टकरने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे ।

सन् १९४७ में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।

दुनिया की तमाम नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने सन् १९२४ में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और कीटाणु-रोगाणुनाशकजल घोषित कर दिया था ।

‘आइने अकबरी में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे । वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।

औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान करते थे ।शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।

कलकत्ता के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली जिले से भराहुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई दिनों तक वह बिगडता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी हिन्दुस्तान लेकर आनेतक खराब हो जाता है ।

अभी रुडकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।

फ्रांसीसी चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोगमें उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !


संत तुलसीदासजी कहते हैं :

गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।

सोमवार, 1 मार्च 2021

महामृत्युंजय मंत्र की रचना कैसे हुई

 शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था. मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए. मृकण्ड ने घोर तप किया. भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं.


महादेव प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा.भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा. ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है. इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है.

ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया. मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे. भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है. मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी. मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी. उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी.

मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे जिन्होंने जीवन दिया है. बारह वर्ष पूरे होने को आए थे. मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे.

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥


समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए. यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की. मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था. यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए. उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए.

इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा. यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए. बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया. यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा. एक प्रचण्ड प्रकाश से यमराज की आंखें चुंधिया गईं.

शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए. उन्होंने हाथों में त्रिशूल लेकर यमराज को सावधान किया और पूछा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को खींचने का साहस कैसे किया? यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे. उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं. आपने ही जीवों से प्राण हरने का निष्ठुर कार्य मुझे सौंपा है.
भगवान चंद्रशेखर का क्रोध कुछ शांत हुआ तो बोले- मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है. तुम इसे नहीं ले जा सकते.

यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है. मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा. महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए. उवके द्वारा रचित महामृत्युंजय मंत्र काल को भी परास्त करता है.

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

मृत्यु से पार ले जाते हैं महाकाल

 


शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में उज्जैन के महाकाल प्रथम पूज्य हैं। त्रिलोक में (भू, भुव: और स्व:) धरती, आकाश और पाताल में तीन शिवलिंग हैं, जो प्रथम पूज्य हैं। आकाश में तारे लिंग स्वरूप हैं, पाताल में हाटकेश्वर और धरती पर महाकाल। सौर पुराण में महाकाल को दिव्यलिंग कहा गया है। कालचक्र की शुरुआत महाकाल से होती है। प्रलय काल में सारा संसार अंधेरे में डूबा था और महाकाल ने ब्रह्माजी को सृष्टि का निर्माण करने को कहा।

पुन: ब्रह्माजी ने महाकाल से प्रार्थना की कि वे महाकाल वन में निवास करें। यह घटना पुरातन काल में उज्जयिनी में हुई और तब से महाकाल उज्जैन में निवास कर रहे हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी हैं।

दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है और यम पर महाकाल की दृष्टि उन्हें नियंत्रित करने के लिए है। महाकाल का समय पर नियंत्रण है। काल या समय के समक्ष मनुष्य और देवता दोनों ही नतमस्तक हैं। इस काल पर अगर किसी का शासन स्थापित है, तो वह हैं महाकाल के रूप में शिव। इसलिए शिव की स्तुति में, शिव का अभिषेक कर भक्त अपने जीवन को आरोग्य, रस, रूप, गंध से सिंचित करने की कामना करते हैं और पूर्ण आयु को प्राप्त कर उन्हीं में विलीन होने की इच्छा प्रकट करते हैं। महाकाल की अर्चना जीवन के श्रेष्ठतम समय के आरम्भ का सूत्रपात है।

अकसर हम भविष्य की दुविधा को लेकर चिंतित रहते हैं, पर उत्तर तो हमेशा समय के गर्भ में है। महाकाल रूप में शिव एक परिपूर्ण स्वस्थ जीवन का आशीष देते हैं और अंतकाल में शिव में विलीन होकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का आश्वासन भी देते हैं।इसी में जीवन की श्रेष्ठता है, क्योंकि भौतिक प्रगति व आध्यात्मिक उन्नति के बीच समन्वय स्थापित हो जाता है।

मृत्यु को अंत और जीवन को आरंभ मान लिया गया है। पर, अंत और आरंभ संयुक्त हैं और इसकी पुनरावृत्ति आदिकाल से सृष्टि के केंद्र में स्थापित महाकाल कर रहे हैं। महाकाल रोगी, जर्जर काया को अपनी करुणा के विस्तार में ले लेते हैं और पूर्ण आरोग्य तथा अकाल मृत्यु से अभय देते हैं। मृत्यु अंत नहीं है, वरन एक शुरुआत है, क्योंकि समय की गति चक्रीय है। इसी सत्य को रेखांकित करने हेतु महाकाल ने चिता की राख का भस्म लेपन किया है।


मृत्यु से पार ले जाते हैं महाकाल-

मृत्यु एक बार आती है, पर उसके पूर्व विघ्न बाधाओं से हार कर हम हजार बार निराश होते हैं, मरते हैं। महाकाल ने समय को जीता है और समय उसी के अधीन होता है, जिसमें शौर्य है। महाकाल रूप में शिव शौर्य और उत्साह का पोषण करते हैं। लेकिन जहां शिव हैं, वहां कुछ वैराग्य भाव अवश्य होगा। स्पष्ट शब्दों में कहें तो महाकाल का मार्ग कर्मयोग का मार्ग है। समय ऐसे लोगों के अधीन होता है।
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!! जय श्री महाकाल !!

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा

 



भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवपुराण में मिलता है. शिवपुराण में कहा गया है, कि पुराने समय में भीम नाम का एक राक्षस था. वह राक्षस कुंभकर्ण और कर्कटी नाम की एक राक्षसी का पुत्र था. परन्तु उसका जन्म ठीक उसके पिता की मृ्त्यु के बाद हुआ था. अपनी पिता की मृ्त्यु भगवान राम के हाथों होने की घटना की उसे जानकारी नहीं थी. समय बीतने के साथ जब उसे अपनी माता से इस घटना की जानकारी हुई तो वह श्री भगवान राम का वध करने के लिए आतुर हो गया.

अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ब्रह्मा जी ने विजयी होने का वरदान दिया. वरदान पाने के बाद राक्षस निरंकुश हो गया. उससे मनुष्यों के साथ साथ देवी देवताओ भी भयभीत रहने लगे.

धीरे-धीरे सभी जगह उसके आंतक की चर्चा होने लगी. युद्ध में उसने देवताओं को भी परास्त करना प्रारम्भ कर दिया. जहां वह जाता मृ्त्यु का तांडव होने लगता. उसने सभी और पूजा पाठ बन्द करवा दिए.


उसके बाद भीम ने प्रसन्नतापूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने का अभियान चलाया.वह सर्वप्रथम कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए पहुँचा.उस पराक्रमी राक्षस भीम ने युद्ध में परास्त कर धर्म प्रेमी और शिव के अनन्य भक्त राजा सुदक्षिण को कैद कर लिया.सुदक्षिण के पैरों में बेड़ी डालकर उन्हें एकान्त स्थान में निरुद्ध (बन्द) कर दिया.उस एकान्त स्थान का लाभ उठाते हुए शिव भक्त राजा सुदक्षिण ने भगवान शिव की उत्तम पार्थिव मूर्ति बनाकर पंचाक्षर मन्त्र अर्थात 'ॐ नम: शिवाय' का जप और उनका भजन-पूजन प्रारम्भ कर दिया.

जब ये बात भीम राक्षस को पता चली तो वह राक्षस क्रोध से आग – बबूला हो उठा.वह राजा का वध करने हेतु हाथ में तलवार लेकर चल पड़ा.ध्यान में मग्न राजा को देखकर उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था.उसने पूजन सामग्री, पार्थिव शिवलिंग, वातावरण को देखकर तथा उसके प्रयोजन और स्वरूप को समझकर मान लिया कि राजा उसके अनिष्ट के लिए ही कुछ कर रहा है.उस महाक्रोधी राक्षस ने ऐसा विचार किया कि इन सब पूजन सामग्रियों सहित इस नरेश को भी मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ.


उसने राजा को डाँट-फटकार लगाते हुए पूछा कि ‘तुम यह क्या कर रहे हो?’ राजा भगवान शंकर के समर्पित भक्त थे.इसलिए उन्होंने निर्भयतापूर्वक कहा कि ‘मैं चराचर जगत के स्वामी भगवान शिव की पूजा कर रहा हूँ.’
यह सुनकर मद में मतवाले उस राक्षस ने भगवान शिव के प्रति बहुत से दुर्वचन बोले और उनका अपमान किया तथा पार्थिव लिंग पर तलवार का प्रहार किया.उसकी तलवार लिंग को छू नहीं पायी, तभी भगवान रुद्र (शिव) तत्काल प्रकट हो गये।भागवान शिव ने अपने पिनाक से उसकी तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर दिया.उसे भस्म कर दिया.देवताओ के प्रार्थना पर भगवान शिव वही ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए.

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

शिव करते हैं जीव चेतना का संचार

 

शिव ही संसार में जीव चेतना का संचार करते हैं। ब्रहमा द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति का उल्लेख एवं सृष्टि का संचार क्रम शिव से है। शिव प्रथम, विष्णु द्वितीय तथा ब्रह्मा तृतीय स्थान पर हैं किंतु सांसारिक मान्यता में ब्रह्मा प्रथम, विष्णु द्वितीय तथा शिव तृतीय प्रलयंकारी के रूप में माने जाते हैं।

शिव स्वरूप में समाया सारा संसार
भगवान शिव के स्वरूप तथा क्रिया विधि के अंतर्गत जो स्थितियां सामने आती हैं, उसे देखें तो जिन्होंने वेद, पुराण के माध्यम से जगत को अपने ज्ञान तथा अध्यात्म से परिचय करवाया, ऐसे महाशिव एक सामान्य प्राणी को अपने विशिष्ट पद से लेकर आत्मा-परमात्मा का अनुभूत सिद्धांत प्रदान करते हैं। संसार सहित ब्रह्मांड के कालक्रम सिद्धांत के अनुसार संसार के भरण-पोषण आदि क्रम को वेदों के माध्‍यम से अन्य देवताओं की नियुक्तियों द्वारा संपादित करने की अवस्था का अनुक्रम दिया गया है।

क्या हैं हमारे कर्म और प्रारब्ध
परम शक्ति महाशिव के तीनों गुणों का उल्लेख समयानुसार युग परिवर्तन के माध्‍यम से सात्विक, राजसी एवं तामसी स्वरूप में दिखाई देता है। ऐसे महाशिव जिन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति तथा जगत के विस्तार एवं निरंतर विकास की प्रणाली को अपनाते हुए ब्रह्मस्वरूप को स्‍थापित किया है, जिसके द्वारा हम क्या है, कैसे हैं, कहां से आए हैं, अंत और प्रारंभ क्या है, कर्म के आधार पर हमारे प्रारब्ध क्या होंगे, इन अवस्थाओं का उपनिषदीय ज्ञान ऋषियों के माध्यम से परम तत्व बिंदु के रूप में हमारे समक्ष विद्यमान किया है।

शिव एकमात्र परम अघोरी
भगवान शिव ऐसे अघोरी हैं जिनके द्वारा संसार की समस्त दिव्य शक्तियां, क्रियाएं तथा प्राकृतिक दृष्टिकोण से संतुलन की उन अवस्थाओं का ज्ञान हमें प्राप्त होता है, जो वर्ण व्यवस्था के साथ आश्रम व्यवस्था को भी हमें अनुभूत करवाता है। अध्यात्म शब्द से देखें तो दो प्रभाव उल्लेखित होते हैं जिसमें क्रमश: अधि आत्म अर्थात वह आत्मा जो अधिभूत, अधियज्ञ के नाम से जानी जाती है। चूंकि समस्त भागवदीय अनुक्रम पंच महाभूतों से संबंधित है, देव षडायन की पौराणिक मान्यता पर निर्भर करता है। इन अवस्था व व्यवस्थाओं को शिव अपने अंश मात्र से धारण किए हुए हैं।

संसार का प्रबंधन और शिव
शिव ही एकमात्र ऐसे देव हैं, जो संसार का प्रबंधन संभालते हैं। उन्हीं के द्वारा ज्ञान तथा वैराग्य जैसे मूलभूत दिव्य साधना का साक्षात्कार करती है। इन अवस्थाओं का ज्ञान एवं अनुभव आध्यात्मिक, परमात्मिक स्थितियों से होकर गुजरता है। संसार तथा ब्रह्मांड के समग्र में भगवान शिव का परम तेज बिंदु अपनी गति से समस्त जीवात्माओं को प्रकाशित करता है। ये सभी जीवात्माएं शिव के उस स्वरूप का दर्शन व अनुभव करती हैं जिसके अंतर्गत संसार की ये सभी परिस्थितियां आश्रम व्यवस्था पर आधारित हैं।

शिव ही परम गुरु
शिव की कृपा एक परम गुरु के रूप में हमारे सामने युगों से चली आ रही है, जो हमें जीवन को बेहतर बनाने की कला, वर्तमान से संघर्ष करते हुए समस्त विकारों पर नियंत्रण करके जीवन यात्रा को विजयी बनाती है। गृहस्थ एवं संन्यास के माध्यम से दो विशेष स्थितियां जीव कल्प में प्राप्त होती हैं। दोनों का ध्येय शिव के परम दर्शन प्राप्त कर सांसारिक यात्रा को विराम देकर जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्त होने का प्रयास ही माना जाता है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

कुंभ पर्व - हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व.

 


कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। 

खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है।

पौराणिक कथाएँ :-
कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र 'जयंत' अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।

अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।

जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।